आईपीएस मैडम के पति की 16 साल की नौकरी खा गए पीएस : एडीजी साहब से काम है तो पहले इन दो कांस्टेबलों से मिलिए! : अपनी ही बिदाई पार्टी में नहीं पहुंचे रिटायर्ड प्रमुख सचिव
मध्य प्रदेश की अफसरशाही में इन दिनों कई मामले चर्चा का विषय बने हुए हैं। IPS मैडम के पति, ADG की शाखा, रिटायर्ड प्रमुख सचिव, युवा कलेक्टर और डेप्युटेशन वाले IAS से जुड़ी पूरी खबर पढ़िए।

1 आईपीएस मैडम के पति की 16 साल की नौकरी खा गए पीएस
मलाईदार विभाग के प्रमुख सचिव साहब के एक फैसले ने इन दिनों अफसरशाही में खूब चौंकाया है। मामला एक आईपीएस मैडम के पति का है, जिन्हें करीब दो साल पहले उत्तर प्रदेश से डेप्युटेशन पर प्रदेश में लाया गया था। इसके बाद उन्हें प्रदेश काडर में संविलियन देने की प्रक्रिया शुरू हुई। संबंधित स्तरों से फाइल को हरी झंडी मिलती गई और आखिरकार मामला विभाग के प्रमुख सचिव की टेबल तक पहुंचा। यहीं से कहानी ने ऐसा मोड़ लिया कि 16 साल की नौकरी पर ही सवाल खड़ा हो गया। बताया जा रहा है कि साहब ने संविलियन की फाइल में उनकी नियुक्ति का वर्ष 2026 दर्ज कर दिया, जबकि उनकी मूल नियुक्ति 2009 की है। यानी 2009 से अब तक की करीब 16 साल की सेवा को मानो एक झटके में किनारे कर दिया गया। इसका असर सिर्फ कागज पर दर्ज नियुक्ति वर्ष तक सीमित नहीं रहेगा। वरिष्ठता, वेतन निर्धारण और आगे मिलने वाले सेवा लाभों पर भी इसका सीधा असर पड़ सकता है। यही वजह है कि मामला अब सामान्य प्रशासनिक गलती से ज्यादा गंभीर माना जा रहा है। साहब के बारे में मंत्रालय में एक पुरानी धारणा भी सुनने को मिलती है—किसी अफसर की फाइल में अगर लाभ का रास्ता साफ दिख रहा हो तो नियम-कायदों की ऐसी बारीकी निकालते हैं कि फायदा मिलने से पहले ही मामला उलझ जाता है।
2 एडीजी साहब से काम है तो पहले इन दो कांस्टेबलों से मिलिए!
लूप लाइन मानी जाने वाली एक बड़ी शाखा में इन दिनों एडीजी साहब से ज्यादा चर्चा दो कांस्टेबलों की हो रही है। कहा जा रहा है कि शाखा में आपका कोई काम अटका है तो सीधे एडीजी साहब तक पहुंचने की जरूरत नहीं, पहले इन दोनों कांस्टेबलों से संपर्क कर लीजिए। विभागीय जांच हो, तबादला आदेश हो या कोई दूसरी फाइल—साहब तक रास्ता बनाने की जिम्मेदारी इन दोनों ने अपने हाथ में ले रखी है। मजेदार बात यह है कि काम कराने की कथित दर भी इतनी कम बताई जा रही है कि बड़े-बड़े दलाल भी शायद हैरान हो जाएं। पांच हजार से लेकर पच्चीस हजार रुपये तक में काम कराने की बात कही जा रही है। कौन सा काम कितने में होगा, इसका हिसाब भी दोनों कांस्टेबल ही तय करते हैं। एडीजी साहब हाल ही में इस शाखा में पहुंचे हैं और माना जा रहा है कि फिलहाल शाखा की अंदरूनी व्यवस्था समझने के लिए उन्होंने इन दोनों पर खास भरोसा कर रखा है। नतीजा यह है कि साहब के आसपास अधिकारियों से ज्यादा इन दोनों कांस्टेबलों की मौजूदगी नजर आने लगी है। वैसे यह शाखा लूप लाइन जरूर मानी जाती है, लेकिन संख्या बल के मामले में विभाग की सबसे बड़ी शाखाओं में शुमार है। ऐसे में यहां काम की कमी नहीं और काम कराने वालों की भी कमी नहीं। बस फर्क इतना है कि एडीजी साहब तक पहुंचने से पहले दो कांस्टेबलों का रास्ता पार करना जरूरी बताया जा रहा है।
3 अपनी ही बिदाई पार्टी में नहीं पहुंचे रिटायर्ड प्रमुख सचिव
आईएएस एसोसिएशन ने हाल ही में बड़े साहब समेत कई रिटायर्ड आईएएस अफसरों के सम्मान में बिदाई पार्टी रखी। पार्टी में ज्यादातर रिटायर्ड अफसर पहुंचे, लेकिन एक प्रमुख सचिव की गैरमौजूदगी ने पूरी महफिल का ध्यान खींच लिया। खास बात यह थी कि पार्टी उन्हीं की बिदाई के लिए भी थी, फिर भी साहब वहां नजर नहीं आए। वैसे साहब का पूरा सेवाकाल शानदार पोस्टिंग से भरा रहा। बड़े और मलाईदार विभागों में जिम्मेदारियां संभालने वाले साहब के लिए आखिरी साल जरूर कुछ ज्यादा ही भारी साबित हुआ। रिटायरमेंट से पहले एक के बाद एक ऐसे झटके लगे कि आखिरी पारी का रंग ही बदल गया। बताया जाता है कि रिटायरमेंट से पहले साहब की कोशिश थी कि एक बार फिर किसी मलाईदार विभाग की जिम्मेदारी मिल जाए। इसके लिए प्रयास भी खूब हुए, लेकिन किस्मत ने साथ नहीं दिया। आखिरकार साहब को ऐसे विभाग से रिटायर होना पड़ा, जिसे अफसरशाही में लूप लाइन की पोस्टिंग माना जाता है। शायद यही वजह रही कि जिस बिदाई में साहब को सम्मान के साथ विदा किया जाना था, उसी में साहब खुद ही शामिल नहीं हुए।
4 एसपी को हटाने के लिए आमने-सामने रहने वाले जनप्रतिनिधि हुए एकजुट!
एक जिले में युवा आईपीएस की ईमानदार कार्यशैली ने ऐसा समीकरण बना दिया है कि जो जनप्रतिनिधि अब तक एक-दूसरे के धुर विरोधी माने जाते थे, वे एसपी साहब को हटाने के मुद्दे पर एक मंच पर आ गए हैं। अलग-अलग गुटों में बंटे इन जनप्रतिनिधियों की एकता का कारण भी खासा दिलचस्प बताया जा रहा है—एसपी साहब की सख्त कार्यशैली। बताया जाता है कि अब तक किसी तरह एसपी को झेल रहे जनप्रतिनिधियों की परेशानी उस वक्त बढ़ गई, जब साहब ने एक पुराने घोटाले की विस्तृत जांच शुरू कर दी। जांच आगे बढ़ी तो कई ऐसे नाम और कड़ियां सामने आने की आशंका जताई जा रही है, जिनसे जुड़े लोगों की बेचैनी बढ़ गई है। यही वजह है कि एसपी को हटाने के लिए अब राजधानी की दौड़ शुरू हो गई है। मजेदार बात यह है कि जिन जनप्रतिनिधियों की आपस में पटरी तक नहीं बैठती थी, वे अब एसपी को हटाने के लिए एकजुट होकर लगातार राजधानी के चक्कर काट रहे हैं। यहां तक कि मुख्यमंत्री से मुलाकात भी की जा चुकी है। हालांकि, मुलाकात के बाद भी एसपी को हटाने को लेकर उन्हें कोई ठोस आश्वासन नहीं मिला।
5 जज साहब की जांच का नहीं दिख रहा 'द एंड'!
प्रदेश की अफसरशाही में इन दिनों एक जांच कमेटी खूब चर्चा में है। वजह यह कि लाखों रुपये सरकारी खजाने से खर्च हो चुके हैं, लेकिन छह साल बाद भी जांच अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच पाई है। अब मंत्रालय के गलियारों में सवाल उठने लगे हैं कि आखिर यह जांच खत्म कब होगी? चर्चा है कि तत्कालीन सरकार ने भ्रष्टाचार के एक बेहद चर्चित मामले की पड़ताल के लिए एक सदस्यीय जांच आयोग बनाया था और इसकी कमान एक रिटायर्ड जज साहब को सौंपी गई थी। लेकिन वक्त के साथ हालात बदल गए। जिस मामले की जांच हो रही है, उस पर अदालत से स्टे मिल चुका है। जिन अफसरों के नाम जांच में थे, वो सेवा से विदा भी हो चुके हैं। इसके बावजूद आयोग की रफ्तार जस की तस बनी हुई है। अफसरशाही में कानाफूसी है कि जज साहब राजधानी से करीब 200 किलोमीटर दूर रहते हैं। तय तारीख पर सरकारी गाड़ी से राजधानी आते हैं, सरकारी खर्च पर ठहरते हैं, लेकिन सुनवाई में अक्सर कोई पक्षकार पहुंचता ही नहीं। दिनभर औपचारिकताएं पूरी होती हैं और फिर शाम को साहब वापस रवाना हो जाते हैं। यह सिलसिला महीनों नहीं, वर्षों से चलता आ रहा है। गलियारों में यह चर्चा भी तैर रही है कि रिटायर्ड जज साहब की पूर्व मुख्य सचिव से करीबी रहे हैं, इसलिए सरकार भी उन पर खास मेहरबान नजर आती है। अब सवाल यही है कि पहले जांच पूरी होगी या फिर यह जांच खुद इतिहास बन जाएगी। फिलहाल मंत्रालय में इसे लेकर तंज यही है—"जांच से ज्यादा लंबी तो उसकी तारीखें हो गई हैं!"
6 अपनी फाइल, अपना प्रस्ताव... और फिर मिल गई संविदा!
एक बड़े विभाग के रिटायर्ड इंजीनियर साहब इन दिनों अपनी संविदा नियुक्ति को लेकर नौकरशाही के गलियारों में खूब चर्चा बटोर रहे हैं। वजह सिर्फ नियुक्ति नहीं, बल्कि उसका तरीका भी बताया जा रहा है। सरकार ने उन्हें छह महीने के लिए संविदा पर फिर से जिम्मेदारी सौंप दी, जबकि सरकारी नियमों की बात करें तो दो बार से अधिक या 65 वर्ष की आयु के बाद संविदा नियुक्ति देने का प्रावधान नहीं माना जाता। लेकिन इस बार चर्चा है कि नियमों को किनारे रखकर साहब के लिए अलग रास्ता निकाल लिया गया। इस नियुक्ति की सबसे दिलचस्प कहानी भी खूब सुनाई जा रही है। कहा जा रहा है कि इंजीनियर साहब ने अपनी संविदा का प्रस्ताव खुद ही तैयार कराया, फाइल भी खुद आगे बढ़वाई और सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय तक पहुंचा दी। वहां से मंजूरी मिली और आदेश भी जारी हो गए। अब मंत्रालय के गलियारों में लोग मुस्कराकर कह रहे हैं कि अगर अपनी पैरवी का कोई "मॉडल फाइल" बनानी हो, तो इंजीनियर साहब से बेहतर उदाहरण शायद ही मिले। चर्चा तो यहां तक है कि इस पूरे मामले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर नियम बड़े हैं या जरूरत के हिसाब से निकाला गया अपवाद।
7 पूर्व बड़े साहब ने दो युवा कलेक्टरों की खुलकर तारीफ की
आईएएस ऑफिसर्स एसोसिएशन की ओर से पिछले दिनों पूर्व बड़े साहब के सम्मान में बिदाई पार्टी रखी गई। मौके पर साहब ने अपने लंबे सेवाकाल के अनुभव साझा किए और प्रदेश में रहते हुए किए गए कामों का भी जिक्र किया। लेकिन महफिल में सबसे ज्यादा ध्यान तब गया, जब साहब ने दो युवा आईएएस अफसरों की जमकर तारीफ कर डाली। बताया जाता है कि पूर्व बड़े साहब ने दोनों अफसरों को बेहद शानदार बताते हुए कहा कि उनके काम से वे खासे प्रभावित रहे हैं। खास बात यह है कि दोनों ही युवा आईएएस फिलहाल प्रदेश के दो बड़े जिलों की कमान संभाल रहे हैं। बड़े साहब की तारीफ को महज औपचारिक विदाई भाषण का हिस्सा नहीं माना गया। आखिर प्रशासन में किसी पूर्व बड़े साहब की जुबान से दो युवा कलेक्टरों के लिए इतने अच्छे शब्द निकलें, तो उसके मायने भी निकाले जाते हैं।
8 कलेक्टर मैडम के ई-अटेंडेंस आदेश से पंचायत सचिव नाराज
एक बड़े जिले में कलेक्टर मैडम के एक आदेश ने पंचायत सचिवों की दिनचर्या ही बदल दी है। मैडम ने जिले के सभी ग्राम पंचायत सचिवों के लिए ई-अटेंडेंस अनिवार्य कर दी है। अब सचिवों को अपनी पदस्थापना वाले गांव के पंचायत कार्यालय में सुबह 10 बजे पहुंचकर ई-अटेंडेंस लगानी होगी और शाम 6 बजे निकलते वक्त दोबारा हाजिरी दर्ज करनी होगी। आदेश कागज पर भले ही सीधा-सादा हो, लेकिन पंचायत सचिवों को यह व्यवस्था कुछ ज्यादा ही सख्त लग रही है। उनका तर्क है कि जब पूरे प्रदेश में इस तरह की व्यवस्था लागू नहीं है तो अकेले उनके जिले में यह प्रयोग क्यों किया जा रहा है? बस इसी सवाल ने सचिवों को एकजुट कर दिया है। बताया जा रहा है कि सचिवों ने अब सीधे राजनीतिक रास्ता पकड़ लिया है। मामले को लेकर भाजपा के एक कद्दावर नेता और पूर्व मंत्री से शिकायत की गई है और उनसे कलेक्टर मैडम का आदेश वापस कराने में मदद मांगी गई है।
9 प्रतिनियुक्ति पर गए प्रमोटी आईएएस अब लौटने को बेचैन
एक प्रमोटी आईएएस को केंद्र सरकार की प्रतिनियुक्ति पर गए अभी कुछ ही महीने हुए हैं, लेकिन साहब का मन अब प्रतिनियुक्ति में नहीं लग रहा। खबर है कि उन्होंने वापसी के लिए अपने स्तर पर प्रयास भी शुरू कर दिए हैं। दरअसल, जब साहब प्रदेश से प्रतिनियुक्ति पर रवाना हुए थे, तब उनकी पोस्टिंग लूप लाइन में थी। ऐसे में उन्हें फिलहाल किसी बड़ी या मनपसंद जिम्मेदारी की उम्मीद भी कम ही थी। लेकिन अब साहब को लग रहा है कि प्रदेश में समीकरण बदल चुके हैं। बताया जाता है कि जिस बड़े साहब से कभी खास उम्मीद नहीं थी, अब वही साहब को पसंद करने वाले अफसरों की सूची में बताए जा रहे हैं। बस इसी बदले समीकरण ने प्रमोटी आईएएस के मन में प्रदेश सरकार में वापसी की उम्मीद जगा दी है। साहब को भरोसा है कि अगर अभी वापसी हो गई तो इस बार लूप लाइन नहीं, बल्कि कोई ढंग की पोस्टिंग मिल सकती है। यही वजह है कि कुछ महीने पहले प्रदेश सरकार से दूर गए साहब अब वापस आने के लिए जोर लगा रहे हैं।
10 प्रमुख सचिव साहब का काम में लगने लगा है मन
प्रमुख सचिव स्तर के एक साहब लंबे समय से डेप्युटेशन पर जाने की कोशिश में जुटे हुए थे। वजह भी खास है—साहब का परिवार लंदन में रह रहा है और उनका मन भी परिवार के पास पहुंचने को बेताब बताया जा रहा था। डेप्युटेशन के लिए साहब ने अपने स्तर पर काफी प्रयास भी किए, लेकिन बात बन नहीं पाई। इसी बीच सरकार ने साहब को एक बड़ा और नया विभाग थमा दिया। बस इसके बाद साहब की कार्यशैली में ऐसा बदलाव आया कि पुराने सहयोगी भी हैरान हैं। कुछ समय पहले तक ऑफिस टाइम खत्म होते ही घर की राह पकड़ लेने वाले साहब अब रात नौ बजे तक दफ्तर में बैठ रहे हैं। सिर्फ इतना ही नहीं, साहब ने विभाग के सभी कार्यालयों के दौरे का कार्यक्रम भी तैयार कर लिया है। फाइलों पर दस्तखत करने से आगे बढ़कर अब विभाग की बारीकियां समझने में भी खूब दिलचस्पी ले रहे हैं। कौन सा काम कैसे होता है, कहां क्या दिक्कत है और व्यवस्था में कहां सुधार की गुंजाइश है—साहब सबकी जानकारी ले रहे हैं। अब इस बदलाव की वजह नई जिम्मेदारी का उत्साह है या फिर डेप्युटेशन की उम्मीद फिलहाल कमजोर पड़ गई है, यह तो साहब ही बेहतर जानते होंगे। लेकिन इतना जरूर है कि लंदन जाने की चाहत ने साहब को पहले दफ्तर से दूर किया था, और बड़े विभाग ने अचानक दफ्तर से इतना करीब ला दिया कि रात नौ बजे तक कुर्सी नहीं छूट रही।





