कमिश्नर से नाराज होकर मैनेजर ने छोड़ी नौकरी : सीनियर आईपीएस कर रहे प्राइवेट कंपनी के रास्ते वापसी की तैयारी : दो महिला आईएएस अफसरों के बीच खत्म होगी जंग
मध्यप्रदेश की अफसरशाही में चर्चाओं का दौर जारी है। कमिश्नर से नाराज मैनेजर ने VRS लिया, सीनियर IPS पोस्ट रिटायरमेंट प्लान में जुटे, दो महिला IAS की जंग खत्म और कई अफसरों की पोस्टिंग चर्चा में।

1 कमिश्नर से नाराज होकर मैनेजर ने छोड़ी नौकरी
सरकारी गलियारों में इन दिनों एक कमिश्नर साहब और उनके ही विभाग के मैनेजर की कहानी खूब चर्चा में है। कि कमिश्नर साहब मैनेजर से कुछ ऐसे काम करवाना चाहते थे, जिनके लिए मैनेजर तैयार नहीं था। बस, यहीं से दोनों के बीच खटास की शुरुआत हो गई। बताया जाता है कि मैनेजर के तैयार न होने के बाद साहब ने पहले उसे राजधानी से सटे एक जिले में भेज दिया। मैनेजर ने इसे भी नौकरी का हिस्सा मानकर स्वीकार कर लिया। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। मंत्रीजी की मेहरबानी से जब मैनेजर दोबारा राजधानी लौट आया तो साहब की नाराजगी भी लौट आई। चर्चा है कि इसके बाद मैनेजर का तबादला राजधानी से काफी दूर एक जिले में कर दिया गया। यानी साहब के तबादले वाले फैसले में दूरी बढ़ती गई और मैनेजर की परेशानी भी। आखिरकार परेशान मैनेजर ने ऐसा फैसला लिया, जिसने पूरे विभाग में चर्चाओं को जन्म दे दिया। नौकरी के महज छह महीने बाकी होने के बावजूद मैनेजर ने वीआरएस लेने का फैसला कर लिया। मैनेजर की दलील थी कि जब नौकरी खत्म होने में सिर्फ छह महीने बचे हैं, तब बार-बार तबादला कर परेशान करने से बेहतर है कि नौकरी ही छोड़ दी जाए।
2 सीनियर आईपीएस कर रहे प्राइवेट कंपनी के रास्ते वापसी की तैयारी
एक सीनियर आईपीएस साहब का रिटायरमेंट जैसे-जैसे नजदीक आ रहा है, वैसे-वैसे वो उनके पोस्ट रिटायरमेंट प्लान पर भी तेजी से काम करते जा रहे हैं। साहब की पहली कोशिश थी कि रिटायरमेंट से पहले ही सरकार उन्हें कोई अहम जिम्मेदारी सौंप दे, जिससे उन्हे रिटायर ही न होने पड़े। लेकिन अभी तक सरकार की ओर से न तो पोस्टिंग मिली और न ही कोई ठोस आश्वासन। साहब ने कुछ समय पहले भर्ती बोर्ड बनवाने के लिए पूरी ताकत लगा दी थी। इसके लिए नियम और शर्तें तैयार करने की कवायद भी शुरू हो गई थी। अगला कदम इसे कैबिनेट में मंजूरी के लिए ले जाना था, लेकिन मामला आगे बढ़ने के बजाय नियम-कायदे की फाइलों में ही अटक गया। भर्ती बोर्ड वाला रास्ता बंद होता दिखा तो साहब ने ओएसडी बनने की कोशिश की। यहां भी बात नहीं बनी। यानी रिटायरमेंट से पहले सरकारी सिस्टम में कोई नई कुर्सी हासिल करने की दोनों कोशिशें फिलहाल सफल नहीं हो सकीं। अब साहब ने प्लान-सी पर काम शुरू कर दिया है। इस बार रास्ता सीधे सरकारी नियुक्ति का नहीं, बल्कि प्राइवेट कंपनी के जरिए सरकार में एंट्री का है। बताया जा रहा है कि साहब एक निजी कंपनी के माध्यम से सरकार से जुड़े किसी काम में अपनी भूमिका बनाने की तैयारी कर रहे हैं।
3 दो महिला आईएएस अफसरों के बीच खत्म होगी जंग
एक बड़े और संवेदनशील विभाग में लंबे समय से चल रही दो महिला आईएएस अफसरों की तनातनी का आखिरकार पटाक्षेप हो गया। सरकार ने दोनों में से एक प्रमोटी आईएएस का तबादला कर दिया है, जबकि सीधी भर्ती वाली आईएएस मैडम को उसी विभाग में बरकरार रखा गया है। दोनों अफसरों के बीच पदस्थापना के पहले दिन से ही पटरी नहीं बैठ रही थी। शुरुआत में मतभेद कामकाज तक सीमित रहे, लेकिन धीरे-धीरे मामला इतना बढ़ गया कि दोनों के बीच आमने-सामने की तल्खी भी सामने आने लगी। पिछले दिनों तो सीधी भर्ती वाली आईएएस मैडम के चैंबर में दोनों महिला अफसरों के बीच ऐसा विवाद हुआ कि प्रमोटी आईएएस मैडम सीधे मुख्य सचिव के चैंबर तक पहुंच गईं। वहां उन्होंने साफ शब्दों में अपनी बात रख दी कि अब वे सचिव मैडम के साथ काम नहीं कर सकतीं। उन्होंने सरकार से अपना तबादला कहीं और करने का अनुरोध कर दिया। सरकार ने भी आखिरकार दोनों के बीच की ‘दूरी’ को प्रशासनिक दूरी में बदलने का फैसला कर लिया। प्रमोटी आईएएस मैडम का तबादला ऐसे विभाग में किया गया है, जिसे अफसरशाही में अपेक्षाकृत आरामदायक और घूमने-फिरने वाला विभाग माना जाता है।
4 फिर डेप्युटेशन पर जाएंगे युवा आईपीएस
साफ-सुथरी छवि वाले एक युवा आईपीएस अफसर का प्रदेश में काम करने में लंबे समय से मन नहीं लग रहा था। यही वजह है कि कूलिंग ऑफ पीरियड खत्म होते ही साहब ने दोबारा केंद्र में डेप्युटेशन के लिए आवेदन कर दिया। साहब की कार्यशैली और साफ छवि को देखते हुए केंद्र सरकार ने भी उन्हें ज्यादा इंतजार नहीं कराया और तत्काल डेप्युटेशन मंजूर कर दिया। साहब को बीएसएफ में आईजी के तौर पर नई जिम्मेदारी मिली है। फिलहाल साहब पुलिस मुख्यालय में अपनी सेवाएं दे रहे थे। अब जल्द ही वे एक बार फिर दिल्ली की ओर रुख करेंगे और बीएसएफ में आईजी के रूप में अपनी नई पारी शुरू करेंगे। यानी प्रदेश की नौकरी से साहब का मन नहीं लगा तो कूलिंग ऑफ खत्म होते ही फिर केंद्र की राह पकड़ ली। इस बार भी जिम्मेदारी छोटी-मोटी नहीं, बल्कि आईजी स्तर की मिली है।
5 कलेक्टर साहब से जनप्रतिनिधियों के बाद सरकार भी नाराज
राजधानी से सटे एक जिले के कलेक्टर साहब इन दिनों दो तरफ से घिरे नजर आ रहे हैं। एक ओर जिले के जनप्रतिनिधि साहब से नाराज हैं तो दूसरी ओर मंत्रालय में बैठे सीनियर अफसर भी उनके कामकाज से खुश नहीं बताए जा रहे हैं। जनप्रतिनिधियों की नाराजगी की वजह साहब का कामकाज का अंदाज है। आरोप है कि साहब जनप्रतिनिधियों के फोन तक रिसीव नहीं करते। यही नहीं, यदि कोई जनप्रतिनिधि साहब से मिलने उनके कार्यालय पहुंच जाए तो उन्हें घंटों चैंबर के बाहर इंतजार करना पड़ता है। ऐसे में जनप्रतिनिधियों का पारा चढ़ना स्वाभाविक है। दूसरी तरफ मंत्रालय में बैठे सीनियर अफसरों की नाराजगी की वजह जिले में चल रहा अवैध उत्खनन है। एनजीटी की रोक के बावजूद जिले में बड़े पैमाने पर अवैध उत्खनन जारी है। मामला इतना गंभीर बताया जा रहा है कि नदी में पनडुब्बी लगाकर तक अवैध उत्खनन किया जा रहा है। जिले में चल रहे इस खेल की जानकारी मंत्रालय तक पहुंची तो एक सीनियर अफसर ने खुद कलेक्टर साहब को मोबाइल लगाकर नाराजगी जता दी। अब साहब के सामने चुनौती दोहरी है—एक तरफ जनप्रतिनिधियों को साधना है और दूसरी तरफ मंत्रालय के नाराज सीनियर अफसरों को जवाब देना है।
6 आखिरकार आईपीएस मैडम को कब मिलेगी डेप्युटेशन पर जाने में सफलता?
एक सीनियर आईपीएस मैडम लंबे समय से डेप्युटेशन पर जाने की कोशिश में लगी हुई हैं, लेकिन हर बार मामला कहीं न कहीं अटक जाता है। मैडम की कोशिशों का सिलसिला पुलिस मुख्यालय में पदस्थ रहते हुए ही शुरू हो गया था। उसी दौरान उन्होंने डेप्युटेशन के लिए आवेदन भी कर दिया था। मैडम को उम्मीद थी कि जल्द ही केंद्र की ओर से बुलावा आ जाएगा, लेकिन इंतजार खत्म होने के बजाय सरकार ने उन्हें फील्ड पोस्टिंग दे दी। यानी मैडम जिस रास्ते पर जाना चाह रही थीं, सरकार ने उन्हें फिलहाल उसके उलट फील्ड में भेज दिया। डेप्युटेशन के साथ-साथ मैडम ने अपने होम कैडर में जाने के लिए भी खूब प्रयास किए। मामला यहां तक पहुंचा कि उन्होंने इसके लिए हाईकोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया, लेकिन वहां से भी मनमाफिक राहत नहीं मिल सकी। अब मैडम के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर डेप्युटेशन की फाइल कब मंजूर होगी। पीएचक्यू से आवेदन, फील्ड पोस्टिंग और फिर होम कैडर के लिए कोर्ट तक की दौड़ के बावजूद मैडम की मंजिल अभी दूर नजर आ रही है।
7 जीत गई आईएएस मैडम की जिद
सरकार ने तबादला किया, लेकिन मैडम ने नई पोस्टिंग स्वीकार करने से साफ इनकार कर दिया। आखिरकार सरकार को ही अपना फैसला बदलना पड़ा। मामला मंत्रालय में पदस्थ एक प्रमोटी आईएएस मैडम का है, जिनका पिछले दिनों एक बड़े विभाग से स्कूल शिक्षा विभाग में तबादला किया गया था। तबादला आदेश निकलने के बाद भी मैडम ने न तो पुराने विभाग से रिलीव होना पसंद किया और न ही स्कूल शिक्षा विभाग में जाकर आमद दी। मैडम का साफ रुख था कि वे किसी भी हालत में स्कूल शिक्षा विभाग में काम नहीं करेंगी। सरकार की ओर से भी काफी समय तक इंतजार किया गया, लेकिन मैडम अपनी जिद पर कायम रहीं। आखिरकार सरकार को ही रास्ता निकालना पड़ा और मैडम का तबादला स्कूल शिक्षा विभाग से बदलकर उच्च शिक्षा विभाग कर दिया गया। अब मैडम जल्द ही पुराने विभाग से रिलीव होकर उच्च शिक्षा विभाग में अपनी नई जिम्मेदारी संभालेंगी। यानी इस पूरे तबादला प्रकरण में आखिरकार मैडम की पसंद की पोस्टिंग ही तय हुई। वैसे मैडम की गिनती साफ-सुथरी छवि और काम करने वाले अफसरों में होती है। शायद यही वजह रही कि सरकार ने भी टकराव बढ़ाने के बजाय मैडम की पसंद के मुताबिक रास्ता निकालना बेहतर समझा।
8 समीक्षा बैठक में प्रमुख सचिव पर नाराज हुए बड़े साहब
तकनीक वाले विभाग की समीक्षा बैठक में पिछले दिनों बड़े साहब का पारा उस वक्त चढ़ गया, जब विभाग के कामकाज की रिपोर्ट और आंकड़े उनके सामने रखे गए। आंकड़ों की स्थिति देखकर बड़े साहब इतने नाराज हुए कि उन्होंने प्रमुख सचिव साहब को ही सीधे निशाने पर ले लिया। बड़े साहब ने प्रमुख सचिव से साफ शब्दों में कह दिया कि रिपोर्ट देखकर ऐसा लग रहा है जैसे विभाग में कोई काम ही नहीं हो रहा। उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि इस तरह काम नहीं चलेगा और अब विभाग को अपनी कार्यप्रणाली में तेजी लानी होगी। बड़े साहब ने आगे के लिए यह भी ताकीद कर दी कि उनकी ओर से जो भी टारगेट तय किए जाएं, उन्हें गंभीरता से लिया जाए और समय पर पूरा किया जाए। समीक्षा बैठक में मिली इस फटकार के बाद प्रमुख सचिव साहब भी सक्रिय हो गए हैं। अब विभाग में काम की रफ्तार बढ़ाने के साथ लंबित टारगेट पूरे करने पर जोर दिया जा रहा है। यानी बड़े साहब की एक बैठक ने विभाग की सुस्त पड़ी मशीनरी को रफ्तार देने का काम कर दिया
9 “त्यागी जी” के कतर दिए पर, नए एमडी ने दिखाई जमीन
शिक्षा से जुड़े एक बड़े निगम में बैठे “त्यागी जी” के दिन इन दिनों अच्छे नहीं चल रहे हैं। एक समय था जब निगम में “त्यागी जी” की मर्जी के बिना पत्ता तक नहीं हिलता था। बड़े से बड़ा फैसला हो या छोटा-मोटा काम, सबमें “त्यागी जी” की सहमति जरूरी मानी जाती थी। हालात ऐसे थे कि निगम में “त्यागी जी” का रुतबा किसी अधिकारी से कम नहीं था। लेकिन अब तस्वीर पूरी तरह बदल गई है। नए एमडी के आने के बाद “त्यागी जी” के पुराने दबदबे पर लगाम लगती नजर आ रही है। अब हालात यह हैं कि निगम में “त्यागी जी” को पानी पिलाने वाला तक कोई नजर नहीं आता। वैसे “त्यागी जी” के खिलाफ शिकायतों का सिलसिला कोई नया नहीं है। भ्रष्टाचार से जुड़ी कई एजेंसियां भी उनके खिलाफ जांच कर चुकी हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया। यही वजह रही कि समय के साथ “त्यागी जी” का रुतबा बना रहा और निगम में उनकी पकड़ भी मजबूत होती गई। नए एमडी ने आते ही निगम के अफसरों और व्यवस्थाओं की एक-एक परत खोलनी शुरू की तो उन्हें कई ऐसे मामले नजर आए, जिनसे यह साफ हुआ कि निगम की कमान “त्यागी जी” अपने ही तरीके से संभाल रहे थे। नियम-कायदे अपनी जगह थे और “त्यागी जी” के अपने कायदे अपनी जगह। एमडी साहब ने ज्यादा कुछ कहे बिना बस वही किया, जो किसी संस्था के मुखिया को करना चाहिए। धीरे-धीरे “त्यागी जी” के अधिकार सीमित किए और उनके पर कतर दिए। अब जो “त्यागी जी” कभी निगम में अपनी तूती बोलते थे, वे जमीन पर आ गिरे हैं। वक्त का पहिया घूम चुका है और निगम में अब “त्यागी जी” की नहीं, एमडी साहब की चल रही है।
10 आखिरकार एडीएम साहब हो गए रिलीव
आर्थिक नगरी छोड़कर छोटे जिले में जाने से बचने की तमाम कोशिशों के बाद आखिरकार एडीएम साहब को रिलीव होना ही पड़ा। लंबे समय से तबादला आदेश के बावजूद आर्थिक नगरी में जमे साहब की आखिरी उम्मीद भी अब खत्म हो गई है। आखिरकार उन्हें नई पदस्थापना के लिए रवाना कर दिया गया है। बताया जाता है कि एक मंत्री की जिद पर सरकार ने आर्थिक नगरी में पदस्थ एडीएम साहब का तबादला एक छोटे जिले में किया था। जिले में बमुश्किल तीन तहसील हैं। ऐसे में आर्थिक नगरी की मलाईदार पोस्टिंग छोड़कर छोटे जिले की जिम्मेदारी संभालना साहब को रास नहीं आ रहा था। तबादला आदेश के बाद साहब ने नई जगह जाने के बजाय पोस्टिंग बदलवाने के लिए खूब जोर लगाया। कोशिश थी कि किसी बड़े जिले में जगह मिल जाए और अगर यह संभव न हो तो मंत्रीजी को मना कर तबादला ही निरस्त करा दिया जाए। साहब ने दोनों रास्ते आजमा लिए, लेकिन कोई रास्ता नहीं खुला। काफी दिनों तक रिलीविंग टलती रही और साहब आर्थिक नगरी में ही जमे रहे। लेकिन आखिरकार ऊपर से आए फरमान के बाद साहब को रिलीव होना पड़ा। अब आर्थिक नगरी की चमक पीछे छूट गई है और साहब को छोटे जिले की हकीकत से रूबरू होना ही पड़ेगा। कहते हैं सरकारी आदेश के आगे आखिरकार बड़े से बड़े मोह को भी हार माननी पड़ती है। एडीएम साहब के मामले में भी यही हुआ। न बड़े जिले का टिकट मिला और न तबादला निरस्त हुआ। आखिर आर्थिक नगरी का मोह छोड़कर साहब को नई जगह की राह पकड़नी ही पड़ी।





