मास्टर प्लान पर आईएएस अफसरों के ग्रुप में छिड़ी बहस, पूर्व सीएस बोले- प्रकाशित न करा पाना मेरी असफलता
भोपाल और इंदौर के मास्टर प्लान में देरी पर IAS अफसरों में बहस छिड़ गई। अवनी वैश्य समेत कई पूर्व अफसरों ने मास्टर प्लान और राजनीतिक इच्छाशक्ति पर सवाल उठाए।

- मास्टरप्लान में हो रही देरी से अफसरशाही नाराज, व्हाट्सएप ग्रुप पर जता रहे नाराजगी
भोपाल। भोपाल और इंदौर के मास्टर प्लान को लागू करने में हो रही देरी अब सिर्फ बिल्डरों और कारोबारियों की चिंता नहीं रह गई है। इस मुद्दे को लेकर प्रदेश की अफसरशाही में भी बहस छिड़ गई है। रविवार को मप्र आईएएस ऑफिसर्स एसोसिएशन के व्हाट्सग्रुप में मास्टर प्लान को लेकर सुबह शुरू हुई चर्चा देर शाम तक चलती रही। खास बात यह रही कि बहस में मौजूदा अफसरों के साथ कई पूर्व मुख्य सचिव और सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी भी शामिल हुए। किसी ने राजनीतिक इच्छाशक्ति पर सवाल उठाए तो किसी ने ग्रुप में राजनीतिक और निजी विचार साझा किए जाने पर आपत्ति जताई। प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव अनुराग जैन ने चर्चा की शुरुआत करते हुए लिखा कि भोपाल और इंदौर के मास्टर प्लान पर काफी काम किया गया था, लेकिन दुर्भाग्य से इसे प्रकाशित नहीं कराया जा सका और इसे वह अपनी असफलता मानते हैं। उन्होंने दिल्ली डेवलपमेंट अथॉरिटी के वाइस चेयरमैन रहते हुए दिल्ली मास्टर प्लान-2041 से मिले अनुभव का जिक्र करते हुए बताया कि उसी आधार पर भोपाल और इंदौर के मास्टर प्लान तैयार करने पर काम किया गया था। जैन ने विशेष रूप से इंदौर के मास्टर प्लान का उल्लेख करते हुए लिखा कि इसमें आठ लेन का एक्सेस कंट्रोल्ड रिंग रोड, उसके दोनों ओर सर्विस रोड और पूरे शहर में विशाल ग्रीन-ब्लू इंफ्रास्ट्रक्चर जैसी अवधारणाओं को शामिल किया गया था। उन्होंने यह भी बताया कि बिल्डिंग बायलॉज में बदलाव कर पूरे प्रदेश में आधुनिक और नवीनतम अवधारणाओं को शामिल करने पर काम किया गया था।
पांच छोटे शहरों के प्लान से जगी उम्मीद
जैन ने टाउन एंड कंट्री प्लानिंग के नए डायरेक्टर कौशलेन्द्र विक्रम सिंह की तारीफ करते हुए लिखा कि उन्हें शुरुआती कुछ सफलताएं मिली हैं। वे पांच छोटे शहरों के मास्टर प्लान पर लोगों की सहमति बनाने और प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में सफल रहे हैं। इससे उम्मीद जगी है कि भोपाल और इंदौर के मास्टर प्लान को भी आगे बढ़ाया जा सकता है। उन्होंने नगरीय प्रशासन विभाग के एसीएस संजय दुबे, टीएंडसीपी डायरेक्टर कौशलेन्द्र विक्रम सिंह और उनकी पूरी टीम को बधाई दी।
अवनी वैश्य ने उठाया राजनीतिक इच्छाशक्ति पर सवाल
पूर्व मुख्य सचिव अवनी वैश्य ने चर्चा को दूसरी दिशा देते हुए लिखा कि समस्या यह है कि पिछले 20 वर्षों में विशेषज्ञों से राय लेकर मास्टर प्लान करीब एक दर्जन बार तैयार हो चुका है, लेकिन हर बार राजनीतिक नेतृत्व ने उसे खारिज कर दिया। वैश्य ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रदेश एक ऐसा ‘सॉफ्ट स्टेट’ बन गया है, जो ऐसे फैसले लेने में असमर्थ है जिनसे मुट्ठीभर लोगों को भी तकलीफ हो सकती है।
1995 के बाद से अटका भोपाल का मास्टर प्लान
रिटायर्ड आईएएस द्वारकादास अग्रवाल ने भोपाल के मास्टर प्लान का इतिहास सामने रखा। उन्होंने लिखा कि भोपाल का आखिरी मास्टर प्लान 1995 में दस साल के लिए प्रकाशित हुआ था। उस समय कृपाशंकर शर्मा आवास एवं पर्यावरण विभाग के प्रमुख सचिव थे और वे स्वयं डिप्टी सेक्रेटरी थे। अग्रवाल के मुताबिक, वर्ष 2008 में भी भोपाल का मास्टर प्लान प्रकाशित हुआ था। उस समय आलोक श्रीवास्तव प्रमुख सचिव थे, लेकिन उसे अंतिम रूप नहीं दिया जा सका। यही प्रक्रिया वर्ष 2023 में भी दोहराई गई, लेकिन उसका भी वही हश्र हुआ।
रंजना चौधरी ने पूछा- क्या 1995 ही हमारी आधार रेखा है?
अग्रवाल की बात पर रिटायर्ड आईएएस रंजना चौधरी ने सवाल उठाया कि यदि स्थिति ऐसी ही है तो क्या व्यावहारिक रूप से शहर की प्लानिंग के लिए हमारी आधार रेखा अब भी वर्ष 1995 ही है? रिटायर्ड आईएएस अनिल श्रीवास्तव ने भी चिंता जताते हुए लिखा कि मध्य प्रदेश की राजधानी दशकों से मास्टर प्लान लागू नहीं कर पा रही है।
भोपाल कभी रहने योग्य शहर माना जाता था’
रिटायर्ड आईएएस केएम आचार्य ने इसे बेहद दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि भोपाल कभी रहने योग्य शहर माना जाता था, लेकिन धीरे-धीरे शहर दूसरी दिशा में जा रहा है। यानी अफसरों की इस चर्चा में सिर्फ मास्टर प्लान की प्रक्रिया ही सवालों के घेरे में नहीं रही, बल्कि राजधानी के भविष्य और उसके बदलते स्वरूप को लेकर भी चिंता सामने आई।
धीरज माथुर ने ग्रुप में राजनीतिक चर्चा पर जताई आपत्ति
हालांकि, चर्चा के बीच रिटायर्ड आईएएस धीरज माथुर ने अलग राय रखी। उन्होंने कहा कि एसोसिएशन का व्हाट्सग्रुप एसोसिएशन और सर्विस से जुड़े मुद्दों पर चर्चा के लिए सीमित रहना चाहिए। इसमें राजनीतिक और निजी विचारों को रखने से बचना चाहिए। इस तरह रविवार को आईएएस एसोसिएशन के ग्रुप में हुई चर्चा ने मास्टर प्लान के मुद्दे को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया। एक तरफ पूर्व अफसरों ने वर्षों से अटके प्लान को लेकर राजनीतिक इच्छाशक्ति पर सवाल उठाए, वहीं दूसरी तरफ कुछ अफसरों ने एसोसिएशन के मंच की मर्यादा और उसके उद्देश्य को लेकर भी अपनी बात साफ-साफ रख दी।





