एसीएस के होटल और शराब के बिल से परेशान युवा आईएएस : मॉर्निंग वॉक से सीनियर आईपीएस तय करते हैं शेयर मार्केट की स्ट्रैटजी : बैठक में यह क्या बोल गए बड़े साहब
मध्य प्रदेश ब्यूरोक्रेसी: IAS-IPS की अंदरूनी चर्चाएं, तबादले और सत्ता के किस्से

1 एसीएस के होटल और शराब के बिल से परेशान युवा आईएएस
प्रदेश के एक बड़े नगर निगम में पदस्थ युवा आईएएस कमिश्नर इन दिनों किसी प्रशासनिक संकट से नहीं, बल्कि एक खास एसीएस साहब की मेहमान नवाज़ी से परेशान बताए जा रहे हैं। चर्चा है कि जैसे ही एसीएस साहब के शहर आने की खबर मिलती है, निगम मुख्यालय में फाइलों से ज्यादा होटल बुकिंग की चिंता शुरू हो जाती है। साहब को ठहरने के लिए शहर का सबसे आलीशान होटल चाहिए और कमरा भी कोई साधारण नहीं, सीधे प्रेसीडेंशियल स्वीट। दिनभर की बैठकों के बाद रात का कार्यक्रम और भी “भारी” हो जाता है। डिनर टेबल पर सबसे महंगी स्कॉच की फरमाइश होती है और फिर कमिश्नर साहब को भी साथ बैठने का न्योता नहीं, बल्कि लगभग आदेश मिल जाता है। मजेदार बात यह है कि रात खत्म होते-होते होटल का बिल भी ऐसा बनता है कि उसे देखकर अच्छे-अच्छों का ब्लड प्रेशर बढ़ जाए। एक-एक विजिट का खर्च लाखों तक पहुंच जाता है और भुगतान की जिम्मेदारी अंततः कमिश्नर साहब के सिर आ गिरती है। अब हाल यह हो गया है कि एसीएस साहब का फोन स्क्रीन पर चमकते ही कमिश्नर साहब का दिल बैठ जाता है। कुछ लोगों का दावा है कि उन्होंने कई बार कॉल रिसीव करने से भी परहेज किया। लेकिन अनुभवी एसीएस साहब भी कम खिलाड़ी नहीं हैं। बताया जाता है कि जब फोन से बात न बने तो सीधे होटल प्रबंधन को निर्देश दे देते हैं और कुछ समय बाद बिल बड़ी शालीनता के साथ कमिश्नर साहब की टेबल पर पहुंच जाता है।
2 मॉर्निंग वॉक से सीनियर आईपीएस तय करते हैं शेयर मार्केट की स्ट्रैटजी
प्रदेश के एक सीनियर आईपीएस अधिकारी इन दिनों अपने विभागीय फैसलों से कम और शेयर बाजार की गतिविधियों से ज्यादा चर्चा में बताए जाते हैं। जैसे ही साहब मॉर्निंग वॉक के लिए निकलते हैं, उनके कदम पार्क की पगडंडियों पर चलते हैं, लेकिन दिमाग सीधे दलाल स्ट्रीट में दौड़ने लगता है। पूरे वॉक के दौरान मोबाइल कान से लगा रहता है और दूसरी तरफ उनके भरोसेमंद निवेश सलाहकार। चर्चा होती है कि आज किस शेयर में एंट्री लेनी है, किसमें होल्ड करना है और किससे दूरी बनानी है। राहगीरों को कई बार लगता है कि कोई बड़ी कानून-व्यवस्था की रणनीति बन रही होगी, लेकिन बातचीत का विषय अक्सर किसी कंपनी का शेयर ही निकलता है। मजेदार बात यह है कि साहब का दिनभर का मूड भी कथित तौर पर बाजार के उतार-चढ़ाव से गहरे जुड़ा हुआ है। जिन शेयरों में निवेश किया है, अगर उनमें हरियाली छा गई तो साहब का चेहरा भी खिला-खिला रहता है। उस दिन मीटिंग में चाय भी आराम से पी जाती है, फाइलें भी मुस्कराकर देखी जाती हैं और मातहतों को भी लगता है कि आज का दिन शुभ है। लेकिन बाजार ने अगर लाल रंग दिखा दिया तो हालात बदल जाते हैं। बताते हैं कि जिस दिन पोर्टफोलियो घाटे में जाता है, उसी दिन साहब के चेहरे पर भी मंदी के बादल छा जाते हैं। फिर अधीनस्थ अधिकारी और कर्मचारी भी सेंसेक्स की चाल को लेकर उतने ही सजग हो जाते हैं, जितने किसी महत्वपूर्ण आदेश को लेकर।
3 बैठक में यह क्या बोल गए बड़े साहब
प्रदेश के प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों किसी फाइल, तबादले या नई नियुक्ति से ज्यादा चर्चा एक वाक्य की हो रही है। यह वाक्य भी किसी सामान्य अफसर का नहीं, बल्कि उन बड़े साहब का है, जिनके बारे में मशहूर है कि वे एक-एक शब्द बेहद सोच-समझकर बोलते हैं। उनके करीबी तो यहां तक कहते हैं कि साहब की बातों में जितने शब्द होते हैं, उससे कहीं ज्यादा उनके मायने होते हैं।
मामला हाल ही में हुई सिंहस्थ तैयारियों की समीक्षा बैठक का है। बैठक में कामकाज की प्रगति पर चर्चा चल रही थी। इसी दौरान बड़े साहब ने अधिकारियों की तरफ देखते हुए सहज अंदाज में कहा—“यह काम तीन महीने में पूरा कर लो, फिर मुझे तो जाना ही है।” बस फिर क्या था। बैठक खत्म हुई और ब्यूरोक्रेसी में इस एक लाइन की व्याख्या का दौर शुरू हो गया। एक वर्ग का मानना है कि साहब ने अपने भविष्य का संकेत दे दिया है। उनका तर्क है कि अगर बड़े साहब खुद जाने की बात कह रहे हैं तो शायद अब वे आगे कोई एक्सटेंशन लेने के इच्छुक नहीं हैं और सम्मानजनक विदाई की तैयारी में हैं। वहीं दूसरे खेमे का कहना है कि इतने अनुभवी अधिकारी कोई भी बात यूं ही नहीं कहते। इस समूह के अनुसार यह बयान दरअसल एक रणनीतिक ‘गूगली’ हो सकता है। मकसद यह कि संभावित दावेदार अभी से सक्रिय हो जाएं, एक-दूसरे की काट में लग जाएं, अपने-अपने समीकरण साधने में व्यस्त हो जाएं और आखिर में बाजी फिर बड़े साहब ही मार ले जाएं।
4 ‘प्रबुद्ध जनमंच’ में छिड़ी रिटायर्ड आईपीएस में वैचारिक जंग
प्रदेश का एक चर्चित व्हाट्सऐप ग्रुप इन दिनों किसी चर्चा मंच से ज्यादा वैचारिक अखाड़ा बना हुआ है। दिलचस्प बात यह है कि बहस कानून-व्यवस्था, पुलिसिंग या प्रशासनिक सुधारों पर नहीं, बल्कि देश के राजनीतिक और ऐतिहासिक विमर्श पर चल रही है। कहानी के मुख्य किरदार हैं दो रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी। इनमें एक सीधे भर्ती होकर सेवा में आए और डीजी के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं, जबकि दूसरे प्रमोटी अधिकारी रहे हैं और आईजी पद से रिटायर हुए हैं। दोनों की सोच और पसंदीदा राजनीतिक-ऐतिहासिक नायक अलग-अलग हैं, इसलिए ग्रुप में जब भी इतिहास और राजनीति की चर्चा शुरू होती है, माहौल गर्म होना तय माना जाता है। सीधे भर्ती वाले रिटायर्ड अधिकारी अक्सर देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की नीतियों और योगदान का उल्लेख करते हुए उन्हें आधुनिक भारत के निर्माण का प्रमुख शिल्पकार बताते हैं। दूसरी ओर प्रमोटी रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपलब्धियों का जोरदार पक्ष रखते हैं और इसी क्रम में नेहरू युग की नीतियों की आलोचना करने से भी नहीं चूकते। पिछले दिनों ऐसी ही एक चर्चा के दौरान मामला कुछ ज्यादा ही गरमा गया। एक टिप्पणी पर नाराज होकर सीधे भर्ती वाले रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी ने ग्रुप में तीखी प्रतिक्रिया देते हुए लिख दिया—“इस तरह की भाषा तथा पंडित नेहरू के बारे में आपके विचार अशोभनीय हैं। प्रबुद्ध कहलाने लायक आप कदापि नहीं हैं।” इस ग्रुप का नाम है—‘प्रयास प्रबुद्ध जनमंच’।
5 पावरफुल होते-होते रह गए एसीएस साहब!
मंत्रालय के गलियारों में इन दिनों एक सौम्य, मृदुभाषी और बेहद संतुलित छवि वाले एसीएस साहब की खूब चर्चा है। वजह यह है कि वे हाल ही में पावरफुल कुर्सी तक पहुंचते-पहुंचते रह गए। मामला लगभग तय माना जा रहा था और प्रशासनिक हलकों में तो लोग नई व्यवस्था के हिसाब से समीकरण भी बैठाने लगे थे। लेकिन ऐन मौके पर ऐसा मोड़ आया कि पूरी पटकथा ही बदल गई। चर्चा है कि फिलहाल एक ऐसे विभाग में पदस्थ साहब, जिसे आमतौर पर ब्यूरोक्रेसी की “लूप लाइन” माना जाता है, अचानक सत्ता और प्रशासन के केंद्र में आने वाले थे। बताया जाता है कि बड़े साहब स्वयं उन्हें एक बेहद प्रभावशाली जिम्मेदारी सौंपने के पक्ष में थे। संकेत इतने मजबूत थे कि कई अफसरों ने तो उन्हें पहले से ही नई भूमिका में देखना शुरू कर दिया था। लेकिन कहते हैं कि राजनीति और प्रशासन में आखिरी मिनट तक कुछ भी तय नहीं होता। ठीक वैसा ही यहां भी हुआ। जब सब कुछ लगभग अंतिम दौर में पहुंच चुका था, तभी मुख्यमंत्री स्तर पर हस्तक्षेप हुआ और पूरा मामला फिलहाल के लिए टाल दिया गया। आदेश नहीं आया और जो लोग बधाइयों की तैयारी कर रहे थे, उन्हें अचानक ब्रेक लगाना पड़ा। हालांकि जानकार इस घटनाक्रम को साहब की हार या दौड़ से बाहर होना नहीं मान रहे। उनका कहना है कि खतरा अभी—सिर्फ टला है, खत्म नहीं हुआ है।
6,नए एसपी की एंट्री और अपराधियों में बेचैनी
प्रदेश के एक बड़े और संवेदनशील जिले में हाल ही में हुई पुलिस कप्तान की अदला-बदली अब चर्चा का विषय बनी हुई है। सरकार ने यहां से एक विवादों में घिरे प्रमोटी आईपीएस अधिकारी को हटाकर सीधे भर्ती वाले युवा आईपीएस को कमान सौंपी है। और लगता है कि नए कप्तान ने आते ही यह संदेश दे दिया है कि उनकी प्राथमिकता क्या रहने वाली है। पुलिस महकमे में चर्चा है कि नए एसपी के पदभार संभालते ही जिले के पुलिस बल में अलग तरह का उत्साह दिखाई देने लगा है। थानों से लेकर जिला मुख्यालय तक यह संदेश गया है कि अब कार्रवाई के मामले में सुस्ती नहीं चलेगी। यही वजह है कि कई अधिकारी और कर्मचारी भी पहले से ज्यादा सक्रिय नजर आ रहे हैं। नए एसपी ने आते ही अपराधियों और संगठित अवैध गतिविधियों के खिलाफ अभियान छेड़ दिया है। हाल के दिनों में गौ-तस्करी के खिलाफ हुई कार्रवाई इसकी सबसे ज्यादा चर्चा में रही। सूत्रों के अनुसार पुलिस ने बड़ी संख्या में पशुओं को बरामद करते हुए कई आरोपियों को गिरफ्तार किया, जिससे जिले में साफ संदेश गया कि अब शिकायतों पर कार्रवाई होगी। जबकि पुराने एसपी साहब को सूचना देने पर भी वे कोई एक्शन नहीं लेते थे। हर मामने में डील हो जाती थी और अपराधी बच जाते थे। यह साहब को लूप लाइन में पदस्थ किया गया है।
7 पूर्व सीएस को देखकर भाग खड़े हुए लोग!
सत्ता और नौकरशाही की दुनिया भी बड़ी अजीब होती है। कुर्सी रहते हुए जिनके एक इशारे पर दर्जनों अफसर हाजिरी लगाने पहुंच जाते हैं, वही लोग कुर्सी छूटने के बाद कभी-कभी खुद को बेहद अकेला पाते हैं। पिछले दिनों ऐसा ही एक दिलचस्प दृश्य राजधानी में देखने को मिला। मौका था एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी के यहां शोक संवेदना व्यक्त करने का। स्वाभाविक रूप से वहां प्रशासनिक सेवा के कई बड़े अधिकारी, विभिन्न विभागों के कर्मचारी और परिचित लोग मौजूद थे। माहौल गंभीर था, लेकिन नौकरशाही के गलियारों में चर्चा का विषय कुछ और ही बन गया। बताया जाता है कि कार्यक्रम में एक पूर्व मुख्य सचिव भी पहुंचे। साहब लंबे समय तक सत्ता और प्रशासन के केंद्र में रहे हैं, इसलिए उन्हें शायद यह उम्मीद रही होगी कि पुराने परिचित अफसर उन्हें देखते ही घेर लेंगे, हालचाल पूछेंगे और औपचारिक अभिवादन का सिलसिला शुरू हो जाएगा। कोई हाथ मिलाने आगे आएगा, कोई चरण स्पर्श करेगा और कोई कुछ देर साथ बैठकर पुरानी बातें करेगा। लेकिन घटनाक्रम उम्मीदों के बिल्कुल उलट रहा। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार जैसे ही लोगों ने पूर्व सीएस साहब को आते देखा, कई लोग नजरें बचाकर दूसरी तरफ खिसक गए। कुछ ऐसे व्यस्त हो गए मानो उन्हें अचानक कोई बेहद जरूरी काम याद आ गया हो। जो अफसर कुछ देर पहले समूह बनाकर चर्चा कर रहे थे, वे भी अलग-अलग दिशाओं में बिखरते नजर आए। नतीजा यह रहा कि साहब को मुख्य द्वार से लेकर बैठक स्थल तक का रास्ता लगभग अकेले ही तय करना पड़ा। न स्वागत करने वालों की भीड़ दिखाई दी।
8 जलवे हों तो एमडी साहब जैसे
एक बड़े और प्रभावशाली विभाग में इन दिनों एक संविदा अधिकारी की चर्चा खूब हो रही है। चर्चा की वजह कोई नई योजना या बड़ी उपलब्धि नहीं, बल्कि उनका अद्भुत आत्मविश्वास और उससे भी ज्यादा उनका रसूख बताया जा रहा है। साहब एक महत्वपूर्ण विभाग में प्रबंध संचालक (एमडी) की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि उनकी संविदा अवधि करीब पंद्रह दिन पहले ही समाप्त हो चुकी है। सामान्य परिस्थितियों में संविदा खत्म होते ही अधिकारी को पद छोड़ना पड़ता है या फिर नए आदेश का इंतजार करना होता है। लेकिन यहां कहानी कुछ अलग ही है। सूत्रों के मुताबिक संविदा अवधि समाप्त होने के बावजूद साहब रोज की तरह दफ्तर पहुंच रहे हैं, एमडी की कुर्सी संभाल रहे हैं और फाइलों पर फैसले भी ले रहे हैं। कार्यालय में आने-जाने वालों को तो कई बार यह एहसास भी नहीं होता कि उनकी नियुक्ति अवधि आधिकारिक रूप से समाप्त हो चुकी है। सबसे ज्यादा चर्चा उस फाइल को लेकर है, जिसके जरिए साहब अपनी संविदा अवधि बढ़वाना चाहते हैं। बताया जाता है कि फाइल की तैयारी से लेकर आगे बढ़ाने तक की पूरी कवायद में साहब ने खुद खास दिलचस्पी दिखाई। नौकरशाही के गलियारों में तो यहां तक चर्चा है कि विभागीय प्रक्रिया के पारंपरिक रास्तों से गुजरने के बजाय फाइल सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय तक पहुंच गई। मजेदार बात यह है कि साहब को पहले भी दो बार संविदा विस्तार मिल चुका है। इतना ही नहीं, सेवा से जुड़े आयु संबंधी मानकों की चर्चाएं भी समय-समय पर होती रही हैं। इसके बावजूद उनके चेहरे पर चिंता की एक भी लकीर दिखाई नहीं देती। उलटे वे पूरी सहजता के साथ अपने रोजमर्रा के कामकाज में व्यस्त हैं।
9 तबादले के दस महीने बाद भी जमी डिप्टी सेक्रेट्री मैडम
प्रदेश की भ्रष्टाचार की जांच करने वाली एक चर्चित एजेंसी में पदस्थ एडीएम स्तर की एक डिप्टी सेक्रेट्री मैडम का तबादला हुए करीब दस महीने बीत चुके हैं। पिछले साल अगस्त में जारी तबादला सूची में उनका नाम भी शामिल था और उन्हें नई जिम्मेदारी सौंपी गई थी। आमतौर पर ऐसे मामलों में अफसरों को एक-दो दिन के भीतर कार्यमुक्त कर नई पदस्थापना वाले स्थान पर भेज दिया जाता है। हुआ भी यही। उसी सूची में शामिल लगभग सभी अधिकारी तत्काल रिलीव होकर अपनी नई जगहों पर पहुंच गए। लेकिन मैडम का मामला कुछ अलग निकला। बताया जाता है कि तबादला आदेश जारी होने के बाद भी वे आज तक उसी एजेंसी में जमी हुई हैं। इतना समय बीत जाने के बावजूद न तो उन्होंने पुराना कार्यालय छोड़ा और न ही नई जिम्मेदारी संभालने की कोई जल्दबाजी दिखाई।मंत्रालय के अफसर भी लगता है मैडम का तबादला करने के बाद भूल गए हैं।
10 एमडी साहब बहुत खुश हैं
एक बड़े विभाग के अधीन आने वाले निगम में पदस्थ एमडी साहब इन दिनों खासे खुश नजर आ रहे हैं। उनकी खुशी की वजह भी बड़ी है—सरकार विभाग की सभी खरीद संबंधी शक्तियां इसी निगम को सौंपने की तैयारी में है। ऐसा होने पर यह तय करने का अधिकार काफी हद तक एमडी साहब के हाथ में होगा कि कौन-सा टेंडर किसे मिले। एमडी साहब प्रमोटी आईएएस अधिकारी हैं और उन्हें इस निगम में जमे हुए पांच साल से अधिक समय हो चुका है। अब जैसे ही खरीद अधिकार मिलने की खबर उनके कानों तक पहुंची है, उनकी इच्छा और मजबूत हो गई है कि रिटायरमेंट तक इसी निगम में बने रहें। इसलिए इन दिनों वे अपने कार्यकाल को यथासंभव लंबा करने की जुगत में भी जुटे बताए जा रहे हैं।





