आईएएस मैडम से बेहद नाराज हैं मुख्यमंत्री : आईजी साहब आखिर कब देंगे आमद? : गजब के खिलाड़ी निकले इंजीनियर साहब!

मध्यप्रदेश की ब्यूरोक्रेसी में इस सप्ताह कई दिलचस्प चर्चाएं हैं। मुख्यमंत्री की नाराज़गी झेल रहीं आईएएस मैडम, आमद का इंतजार करते आईजी, इस्तीफा देने वाले आईपीएस, योग प्रेमी एसीएस और जनप्रतिनिधियों के निशाने पर आए कलेक्टर समेत पढ़िए 10 चर्चित प्रशासनिक गॉसिप।
आईएएस मैडम से बेहद नाराज हैं मुख्यमंत्री : आईजी साहब आखिर कब देंगे आमद? : गजब के खिलाड़ी निकले इंजीनियर साहब!
1 आईएएस मैडम से बेहद नाराज हैं मुख्यमंत्री
सचिव स्तर की सीधी भर्ती वाली एक आईएएस मैडम इन दिनों सत्ता के गलियारों में खासा चर्चा का विषय बनी हुई हैं। वजह है उनकी कार्यशैली, जिससे खुद मुख्यमंत्री नाराज बताए जा रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि मैडम जिस विभाग की कमान संभाल रही हैं, उसका जिम्मा भी सीधे मुख्यमंत्री के पास है। चर्चा है कि मुख्यमंत्री चाहते हैं कि उनके स्तर से भेजी जाने वाली फाइलों का त्वरित निराकरण हो, लेकिन मैडम का अंदाज कुछ अलग ही है। बताया जाता है कि कई फाइलें दिनों तक उनकी टेबल पर 'आराम' करती रहती हैं, और जब आगे बढ़ती हैं तो अनावश्यक आपत्तियों के साथ एक टेबल से दूसरी टेबल का सफर शुरू हो जाता है। यदि मैडम ने जल्द अपनी कार्यशैली में बदलाव नहीं किया, तो उन्हें सीधे मुख्यमंत्री के सामने जवाब देना पड़ सकता है। अब देखना यह है कि मैडम अपनी कार्यशैली बदलती हैं या फिर मुख्यमंत्री का बुलावा पहले पहुंचता है।

2 आईजी साहब आखिर कब देंगे आमद?
तबादला सूची में लूप लाइन से बाहर निकलकर मैदानी पोस्टिंग पाने वाले एक आईजी साहब इन दिनों खुद असमंजस में हैं। आमतौर पर ऐसी पोस्टिंग किसी भी अफसर के लिए राहत की खबर मानी जाती है, लेकिन साहब की कहानी कुछ अलग ही है। चर्चा है कि उनकी पहली पसंद आर्थिक नगरी का ग्रामीण इलाका था। जब वहां बात नहीं बनी तो उन्होंने एक बड़े शहर के ग्रामीण जिले में जाने पर भी हामी भर दी। लेकिन किस्मत ने ऐसा पलटा खाया कि तबादला सूची में उनका नाम एक छोटे से जोन के आईजी के रूप में निकल आया। बस, यहीं से साहब का उत्साह ठंडा पड़ गया। सूत्र बताते हैं कि साहब ने अपनी पुरानी पोस्टिंग से विधिवत विदाई तो ले ली, लेकिन नई जगह अब तक आमद नहीं दी है। सत्ता के गलियारों में चर्चा है कि पोस्टिंग बदलवाने की आस में साहब दिल्ली तक की दौड़ लगा आए। हालांकि वहां से भी कोई ठोस भरोसा नहीं मिला। अब सबकी निगाहें इसी पर टिकी हैं कि साहब पहले नई कुर्सी संभालेंगे या फिर तबादला आदेश में ही कोई नया मोड़ आ जाएगा।

3 गजब के खिलाड़ी निकले इंजीनियर साहब!
एक सरकारी कंपनी के एमडी की कुर्सी पर विराजमान इंजीनियर साहब इन दिनों अपनी 'मास्टर स्ट्रोक' रणनीति को लेकर खूब चर्चाओं में हैं। कहते हैं कि साहब ने पहले तो खुद ही सरकार को फाइल भेजकर नियमों की परवाह किए बिना संविदा नियुक्ति हासिल कर ली। इसके बाद जब विरोधियों ने विधानसभा तक सवाल पहुंचाने शुरू किए और शिकायतों का दौर तेज हुआ, तो साहब ने ऐसा दांव चला कि हर कोई चौंक गया। चर्चा है कि साहब ने कंपनी के आला अफसरों से अपने ही पद का विज्ञापन जारी करवा दिया। विज्ञापन देखते ही दावेदारों की उम्मीदें परवान चढ़ गईं और शिकायत करने वालों को भी लगा कि अब तो साहब की विदाई तय है। लेकिन अंदरखाने की खबर कुछ और ही है। बताया जा रहा है कि यह पूरा खेल सिर्फ माहौल बनाने के लिए रचा गया। विज्ञापन अपनी जगह है, लेकिन साहब की कुर्सी फिलहाल पूरी तरह सुरक्षित मानी जा रही है। सत्ता और प्रशासनिक गलियारों में कानाफूसी है कि इंजीनियर साहब अपना पूरा कार्यकाल आराम से पूरा करेंगे, जबकि दावेदार अभी भी 'नई नियुक्ति' का इंतजार कर रहे हैं।

4 अंतिम दौर में तबादला सूची से कट गया आईपीएस का नाम
पुलिस महकमे के सीधे-सादे और शांत स्वभाव वाले एक युवा आईपीएस अफसर का नाम पिछले दिनों मंत्रालय की एक बेहद अहम पोस्टिंग के लिए लगभग तय माना जा रहा था। चर्चा तो यहां तक थी कि पुलिस मुख्यालय से प्रस्ताव सरकार तक पहुंच चुका है और औपचारिक आदेश जारी होना ही बाकी है। लेकिन ऐन वक्त पर पूरा समीकरण बदल गया। सत्ता के गलियारों में कानाफूसी है कि मुख्यमंत्री कार्यालय ने प्रस्ताव पर गहन पड़ताल के बाद साहब का नाम सूची से हटा दिया। इसके बाद मंत्रालय की कुर्सी तक पहुंचने का उनका सपना फिलहाल अधूरा रह गया। अब हालात यह हैं कि साहब अपनी मौजूदा जिम्मेदारी ही निभाते रहेंगे। हालांकि प्रशासनिक हलकों में यह चर्चा भी है कि उनकी ईमानदार और सरल छवि पर किसी तरह का सवाल नहीं है, लेकिन इस बार किस वजह से अंतिम समय में उनका नाम कटा, इसका जवाब तलाशने में अफसरशाही अब भी जुटी हुई है।

5 मैडम के कम्प्युटर में क्यों रुक जाती हैं फाइलें
मंत्रालय के गलियारों में इन दिनों एक साफ-सुथरी छवि वाली एसीएस मैडम की कार्यशैली सबसे ज्यादा चर्चा में है। वजह कोई विवाद नहीं, बल्कि उनकी ई-फाइलों की रफ्तार है। सवाल यह है कि आखिर जो फाइल एक बार मैडम के कंप्यूटर तक पहुंच जाती है, वह आगे बढ़ने में इतना वक्त क्यों लेती है? ई-ऑफिस सिस्टम लागू होने के बाद ज्यादातर अफसरों ने अपनी कार्यशैली बदल ली है। फाइल पर तुरंत फैसला, नहीं तो आपत्ति लगाकर वापस—यही नया चलन बन गया है। लेकिन मैडम का अंदाज सबसे अलग बताया जाता है। चर्चा है कि कई अहम फाइलें दिनों तक उनके डिजिटल इनबॉक्स में ही 'विश्राम' करती रहती हैं। न मंजूरी मिलती है, न आपत्ति, और न ही फाइल आगे बढ़ती है। दिलचस्प यह भी है कि मैडम अपने तेज-तर्रार स्वभाव के लिए जानी जाती हैं। ऐसे में विभाग का कोई अफसर यह पूछने की हिम्मत नहीं जुटा पाता कि आखिर फाइल रुकी क्यों है। नतीजा यह कि फाइल भेजने वाला रोज स्टेटस देखता है, लेकिन स्क्रीन पर वही पुराना संदेश दिखाई देता है—"Pending at ACS."

6 अब एएसपी साहब किसके लिए करेंगे ड्यूटी?
एक विधानसभा क्षेत्र में उपचुनाव की आहट क्या हुई, एक कद्दावर नेता ने अपने हिसाब से पूरी बिसात बिछानी शुरू कर दी। चर्चा है कि चुनावी रणनीति के तहत सबसे पहले जिस मोहरे को फिट कराया गया, वह थे एक एडिशनल एसपी साहब। खास कोशिशों के बाद उनकी पसंदीदा जिले में पोस्टिंग भी हो गई। वजह भी साफ बताई जा रही थी—अगर टिकट मिला, तो चुनावी मैदान में सब कुछ अनुकूल रहना चाहिए। लेकिन राजनीति में आखिरी फैसला कब किसका खेल बिगाड़ दे, यह कोई नहीं जानता। टिकट की सूची आई तो नेता जी का नाम गायब था। कहते हैं, जितना बड़ा झटका नेता जी को लगा, उतना ही सन्नाटा एएसपी साहब के खेमे में भी छा गया। अब सत्ता और प्रशासनिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा इसी सवाल की है कि जिस रणनीति को ध्यान में रखकर साहब की पोस्टिंग हुई थी, उसके ध्वस्त हो जाने के बाद आखिर उनकी चुनावी 'केमिस्ट्री' किसके साथ बैठेगी? नई परिस्थितियों में साहब पूरी तरह सरकारी भूमिका निभाएंगे या फिर पुराने समीकरणों की परछाई चर्चा का विषय बनी रहेगी?

7 कमिश्नर साहब की बैठक में पहले शुगर टेस्ट, फिर एंट्री!
एक बड़े संभाग में हाल ही में पदस्थ हुए प्रमोटी आईएएस कमिश्नर साहब इन दिनों अपनी अनोखी कार्यशैली को लेकर चर्चा में हैं। जिले-जिले जाकर समीक्षा बैठकें लेने निकले साहब ने पहले ही दौरे में ऐसा नज़ारा देखा कि उनका पारा चढ़ गया। बैठक चल रही थी और अधिकारी बारी-बारी से वॉशरूम जाने के लिए उठते जा रहे थे। कुछ देर तक तो साहब ने इसे नजरअंदाज किया, लेकिन जब सिलसिला थमने का नाम नहीं लिया तो उन्होंने बैठक बीच में ही रोक दी। मुस्कुराते हुए, लेकिन तल्ख अंदाज में सवाल दाग दिया—"क्या आप सब शुगर के मरीज हैं, जो बार-बार वॉशरूम जा रहे हैं?" चर्चा है कि साहब ने बात यहीं खत्म नहीं होने दी। बैठक में मौजूद मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी से कहा कि अगर इतनी ही परेशानी है तो सभी अधिकारियों की शुगर जांच करा ली जाए। बस फिर क्या था, बैठक में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया। अब तो संभाग में एक नई ही कानाफूसी चल पड़ी है। कहा जा रहा है कि साहब के अगले जिला दौरे से पहले स्वास्थ्य विभाग की टीम भी सक्रिय हो गई। मजाक-मजाक में अफसरों के बीच यह चर्चा होने लगी कि अब कमिश्नर साहब की समीक्षा बैठक में शामिल होने से पहले एजेंडा नहीं, 'शुगर लेवल' दुरुस्त रखना ज्यादा जरूरी है।

8 बॉस से बिगड़ी बात तो आईपीएस ने भेज दिया इस्तीफा!
पुलिस महकमे में इन दिनों एक आईपीएस अफसर का इस्तीफा चर्चा का बड़ा विषय बना हुआ है। बड़े शहर में अहम जिम्मेदारी संभाल रहे इस अफसर के कदम ने अफसरशाही के गलियारों में कई तरह की अटकलों को जन्म दे दिया है। मैदानी पोस्टिंग पर रहते हुए किसी आईपीएस का इस्तीफा देना वैसे भी बेहद दुर्लभ माना जाता है। चर्चा है कि साहब ने अपना इस्तीफा पुलिस मुख्यालय को भेज दिया है। हालांकि मुख्यालय ने फिलहाल उसे आगे बढ़ाने की जल्दबाजी नहीं दिखाई है। बताया जा रहा है कि इस्तीफा अभी भी वहीं 'होल्ड' पर है और उम्मीद की जा रही है कि बातचीत से मामला सुलझ जाए। अंदरखाने की कानाफूसी कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। कहा जा रहा है कि साहब और उनके बॉस के बीच लंबे समय से तालमेल नहीं बैठ पा रहा था। कामकाज को लेकर बढ़ती खींचतान आखिर उस मोड़ पर पहुंच गई, जहां साहब ने इस्तीफे का रास्ता चुन लिया। हालांकि आधिकारिक तौर पर उन्होंने इसकी वजह निजी कारण बताई है।

9 तीन बजते ही शुरू हो जाता है 'योग दरबार'!
एक प्रशासनिक संस्थान में पदस्थ एसीएस स्तर के एक वरिष्ठ अफसर इन दिनों अपने नए शौक को लेकर खूब चर्चा में हैं। कहते हैं कि जैसे ही घड़ी की सुई तीन पर पहुंचती है, साहब का पूरा ध्यान फाइलों से हटकर योग की ओर चला जाता है। फिर क्या अधिकारी और क्या कर्मचारी, सभी को काम छोड़कर योग सत्र में शामिल होना पड़ता है। दिलचस्प बात यह है कि यह सिलसिला अब रोज का नियम बन चुका है। कई अधिकारी मजाक में कहते हैं कि अब दफ्तर में तीन बजे का मतलब चाय का ब्रेक नहीं, बल्कि 'योग ब्रेक' हो गया है। जो जहां होता है, उसे वहीं से योग मैट की तलाश शुरू करनी पड़ती है। मंत्रालय के गलियारों में अब इस बात की भी खूब कानाफूसी है कि आखिर साहब को योग का यह जुनून किसने चढ़ाया। इससे भी बड़ा सवाल यह है कि रोज ठीक तीन बजे ही योग शुरू करने का मुहूर्त किसने तय किया? कोई इसे स्वास्थ्य सुधार का अभियान बता रहा है तो कोई इसे साहब की नई कार्यशैली का हिस्सा मान रहा है।

10 कलेक्टर साहब से नाराज़ हैं सारे जनप्रतिनिधि!
एक बड़े जिले के कलेक्टर साहब इन दिनों अपने ही जिले के जनप्रतिनिधियों के निशाने पर बताए जा रहे हैं। खास बात यह है कि मंत्री, सांसद और विधायक—जो आमतौर पर अलग-अलग सुर में नजर आते हैं—इस बार एक ही बात पर सहमत दिखाई दे रहे हैं। चर्चा है कि सभी की नाराजगी का कारण कलेक्टर साहब की कार्यशैली है। बताया जा रहा है कि पिछले कुछ दिनों में एक-एक कर सभी जनप्रतिनिधियों ने मुख्यमंत्री से मुलाकात की और कलेक्टर साहब को जिले से हटाने की मांग भी रखी। हर किसी के अपने-अपने तर्क रहे, लेकिन निष्कर्ष एक ही बताया जा रहा है। जानकारों का कहना है कि कलेक्टर साहब नियम-कायदों के मामले में बेहद सख्त माने जाते हैं। फाइलों में नियमों से इतर कोई गुंजाइश छोड़ना उन्हें पसंद नहीं है। यही वजह है कि कई मामलों में जनप्रतिनिधियों की अपेक्षाएं पूरी नहीं हो पा रही हैं और नाराजगी लगातार बढ़ती जा रही है।







Abhishek Dubey

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