एसीएस से नाराज मंत्री की कार्यक्रम से दूरी : सीनियर आईपीएस को सरकार ने दिया झटका : अकादमी में रिटायर्ड आईएएस ने छेड़ा 'संगीत राग'!
एसीएस से नाराज मंत्री, सीनियर IPS को झटका, IAS-IPS पोस्टिंग की हलचल | सत्ता के 10 चर्चित किस्से

1 एसीएस से नाराज मंत्री की कार्यक्रम से दूरी
अपने अनोखे अंदाज और बेबाक मिजाज के लिए मशहूर एक मंत्री जी इन दिनों एक एसीएस साहब से खासे खफा बताए जा रहे हैं। वजह भी कम दिलचस्प नहीं है। कहते हैं कि एक बड़े एमओयू कार्यक्रम की सूचना मंत्री जी तक वक्त रहते पहुंची ही नहीं। बस फिर क्या था... मंत्री जी ने भी अपनी नाराजगी जताते हुए कार्यक्रम से दूरी बनाई और उसमें शामिल ही नहीं हुए। इस कार्यक्रम में,मुख्यमंत्री से लेकर केन्द्रीय मंत्री तक मौजूद रहे। लेकिन असली गॉसिप तो इसके बाद शुरू हुई। चर्चा है कि कार्यक्रम में दो पक्षों के बीच एमओयू होने का खूब शोर रहा, मंच भी सजा, तस्वीरें भी खिंचीं, लेकिन जब कागजों पर नजर गई तो पता चला कि हस्ताक्षर दोनों पक्षों के नहीं थे। इसकी वजह बताई जा रही है कि एमओयू की ड्राफ्टिंग में काफी गड़बड़ियां थी लेकिन समय नहीं था कि इसमें सुधार किया जा सके। इस वजह से आनन फानन में बिना हस्ताक्षर के एमओयू एक्सचेंज कर लिया गया।
2 सीनियर आईपीएस को सरकार ने दिया झटका
पिछले दिनों सरकार ने एक एडीजी को रिटायरमेंट के पहले स्पेशल डीजी बना दिया। लेकिन कहानी में ट्विस्ट तब आया, जब उनसे सीनियर एक आईपीएस अफसर केंद्रीय प्रतिनियुक्ति से वापस प्रदेश लौट आए। सरकार ने सीनियरिटी का संतुलन बनाए रखने के लिए कैबिनेट से मंजूरी लेकर स्पेशल डीजी का एक विशेष पद सृजित किया और लौटे हुए अफसर को भी उसी रैंक पर पदस्थ कर दिया। मामला यहीं तक सीमित रहता तो ठीक था, लेकिन हाल ही में एक स्पेशल डीजी के रिटायर होने के बाद एक और सीनियर आईपीएस ने अपनी पदोन्नति के लिए पुलिस मुख्यालय से प्रस्ताव भिजवा दिया। साहब को उम्मीद थी कि अब उनकी भी लॉटरी लग जाएगी, लेकिन सरकार ने ऐसा दांव चला कि सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया। जिस विशेष पद के सहारे व्यवस्था बनाई गई थी, उसे ही खत्म कर दिया गया। नतीजा यह हुआ कि पुलिस मुख्यालय से भेजा गया प्रस्ताव भी फाइलों में ही दम तोड़ गया। अब महकमे में चर्चा है कि साहब को स्पेशल डीजी की कुर्सी के लिए अभी थोड़ा और इंतजार करना पड़ेगा।
3 अकादमी में रिटायर्ड आईएएस ने छेड़ा 'संगीत राग'!
प्रदेश की प्रशिक्षण अकादमी में इन दिनों एक दिलचस्प किस्सा खूब सुनाया जा रहा है। फाउंडेशन कोर्स के प्रशिक्षु अधिकारियों को सुशासन, नेतृत्व और बेहतर प्रशासन के गुर सिखाने के लिए एक रिटायर्ड आईएएस अधिकारी को विशिष्ट वक्ता के तौर पर बुलाया गया था। युवा अफसर पूरी तैयारी के साथ पहुंचे थे कि प्रशासनिक अनुभव, निर्णय क्षमता और सिस्टम की बारीकियों पर कुछ नया सीखने को मिलेगा।लेकिन साहब शायद किसी और ही मूड में थे। मंच संभालते ही उन्होंने प्रशासन की बजाय संगीत का सुर छेड़ दिया। बात शास्त्रीय संगीत से शुरू हुई, फिर राग-रागिनियों से होती हुई सीधे बॉलीवुड के बदलते संगीत ट्रेंड तक पहुंच गई। वक्त बीतता गया, लेकिन प्रशासन और सुशासन की क्लास का इंतजार ही होता रहा। हाल यह रहा कि सामने बैठे प्रशिक्षु अफसर समझ ही नहीं पाए कि इस पूरे संगीत प्रवचन का उनके फाउंडेशन कोर्स से आखिर क्या रिश्ता है। हालांकि वक्ता बेहद सीनियर थे, इसलिए किसी ने बीच में टोकने की हिम्मत नहीं की। सभी पूरे धैर्य से 'राग' सुनते रहे। अब अकादमी के गलियारों में यही चर्चा है कि उस दिन अफसरों को गवर्नेंस के गुर कम और संगीत का ज्ञान ज्यादा मिला।
4 बधाइयों की बरसात... फिर छा गई खामोशी!
राज्य पुलिस सेवा से आईपीएस अवार्ड के लिए हुई हालिया डीपीसी के बाद पुलिस महकमे में एक दिलचस्प किस्सा चर्चा का विषय बना हुआ है। बैठक खत्म होते ही खबर उड़ गई कि लंबे समय से इंतजार कर रहे एक सीनियर पुलिस अफसर का नाम आखिरकार आईपीएस अवार्ड के लिए मंजूर हो गया है। फिर क्या था... साहब का फोन लगातार बजने लगा। दोस्तों, शुभचिंतकों और करीबी अफसरों ने बधाइयों की झड़ी लगा दी। साहब भी पूरे उत्साह के साथ शुभकामनाएं स्वीकार करते रहे। कुछ देर के लिए तो माहौल ऐसा बन गया, मानो बरसों का इंतजार आखिर खत्म हो गया हो। लेकिन खुशी ज्यादा देर टिक नहीं पाई। दो-तीन दिन बाद जब हकीकत सामने आई तो पता चला कि इस बार भी मामला वहीं का वहीं है। साहब का नाम तो हर बार की तरह डीपीसी में जरूर रखा गया, लेकिन विभागीय जांचें लंबित होने की वजह से उनके मामले पर अंतिम मुहर नहीं लग सकी। नतीजा, आईपीएस का सपना एक बार फिर अधूरा रह गया।
5 'ऑफिस' से ज्यादा गेस्ट हाउस पसंद!
आर्थिक नगरी में पदस्थ एक युवा आईएएस अफसर इन दिनों अपनी अनोखी कार्यशैली को लेकर सत्ता और प्रशासनिक गलियारों में खूब चर्चा बटोर रहे हैं। चर्चा है कि साहब का दफ्तर से रिश्ता कुछ ऐसा है कि दिनभर ऑफिस में उनकी मौजूदगी ढूंढे नहीं मिलती। इतना ही नहीं, सीनियर अफसरों के फोन भी अक्सर अनसुने रह जाते हैं। कहा जा रहा है कि साहब का असली 'ऑफिस टाइम' शाम ढलने के बाद शुरू होता है। वे सीधे विभाग के गेस्ट हाउस पहुंचते हैं, वहीं जरूरी फाइलें मंगवाई जाती हैं, जिन पर जरूरी समझा तो हस्ताक्षर कर दिए जाते हैं। जिन अधिकारियों को निर्देश देना होता है, उन्हें भी गेस्ट हाउस में ही तलब कर लिया जाता है। दिनभर की प्रशासनिक गतिविधियां मानो शाम की इस बैठक में सिमट जाती हैं। इसके बाद साहब अपने मोबाइल पर एक नजर डालते हैं। जिन कॉल का जवाब देना जरूरी लगता है, उन्हें कॉल बैक कर लेते हैं और बाकी कॉल अगले दिन की किस्मत पर छोड़कर बंगले की राह पकड़ लेते हैं। चर्चा है कि लगातार संवादहीनता और अलग अंदाज में काम करने की शैली से शीर्ष स्तर पर नाराजगी बढ़ रही है। हालात ऐसे बताए जा रहे हैं कि अब साहब के 'विकल्प' पर भी गंभीरता से मंथन शुरू हो गया है।
6 पसंदीदा जोन की तलाश... इंतजार बरकरार!
एक आईजी साहब इन दिनों अपनी पोस्टिंग को लेकर फिर सुर्खियों में हैं। लंबे समय से लूप लाइन में बैठे साहब की तमन्ना आर्थिक नगरी जैसे बड़े और अहम जोन की कमान संभालने की है। इसके लिए सत्ता के गलियारों से लेकर संगठन के प्रभावशाली दरवाजों तक दस्तक देने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी गई। हर तबादला सूची से पहले उम्मीदें परवान चढ़ती हैं, लेकिन सूची आते ही साहब को हाथ लगती है तो सिर्फ निराशा। देर रात जारी ताजा सूची में भी साहब का नाम जरूर आया, लेकिन उस जोन के लिए नहीं, जिसका इंतजार उन्हें बरसों से था। उल्टे उन्हें ऐसे छोटे जोन की जिम्मेदारी सौंप दी गई, जिसे देखकर महकमे में फिर कानाफूसी शुरू हो गई। दिलचस्प बात यह है कि इससे पहले भी सरकार एक बार साहब को जोनल पोस्टिंग दे चुकी थी, लेकिन उस समय उन्होंने नई जगह ज्वाइन करने के बजाय लूप लाइन में ही बने रहना ज्यादा बेहतर समझा था। अब सबकी नजर इस बात पर है कि इस बार साहब नई जिम्मेदारी संभालते हैं या फिर पुराने ठिकाने पर ही डटे रहते हैं। महकमे में तो अब तरह-तरह की चर्चाएं हैं। कुछ लोग इसे महज संयोग बता रहे हैं, तो कुछ का कहना है कि हर सूची में साहब का नाम तो आ जाता है, लेकिन मंजिल हर बार बदल जाती है। वहीं कुछ कानाफूसी यह भी है कि कहीं कोई ताकतवर हाथ ऐसा तो नहीं, जो जानबूझकर साहब की राह आर्थिक नगरी तक पहुंचने से पहले ही मोड़ देता है।
7 'मुझे जाने दो...' पर सरकार नहीं मान रही!
प्रदेश के एक सीनियर रिटायर्ड आईएएस के युवा सहाबजादे इन दिनों प्रशासनिक गलियारों में खासे चर्चा में हैं। चर्चा है कि मौजूदा व्यवस्था, खासकर शीर्ष प्रशासनिक नेतृत्व की कार्यशैली से उनकी नाराजगी किसी से छिपी नहीं है। बताया जाता है कि प्रदेश में उनका मन नहीं लग रहा था, इसलिए उन्होंने केंद्रीय प्रतिनियुक्ति का रास्ता चुन लिया। दिलचस्प बात यह रही कि केंद्र ने भी ज्यादा देर नहीं लगाई। प्रतिष्ठित प्रशासनिक अकादमी में पांच साल की प्रतिनियुक्ति के आदेश जारी हो गए। आमतौर पर ऐसे आदेश के बाद अफसर नई जिम्मेदारी संभालने की तैयारी में जुट जाते हैं, लेकिन यहां कहानी ने अलग ही मोड़ ले लिया। करीब डेढ़ महीना बीत चुका है, मगर राज्य सरकार अब तक साहब को कार्यमुक्त करने के मूड में नहीं दिख रही। उल्टा, इसी बीच उनका तबादला भी एक निगम के एमडी की जिम्मेदारी से हटाकर लूप लाइन में कर दिया गया। अब महकमे में चर्चा है कि साहब एक तरफ केंद्र जाने की राह देख रहे हैं, तो दूसरी तरफ राज्य सरकार उन्हें हर हाल में रोकने पर आमादा नजर आ रही है। गलियारों में तो मजाकिया अंदाज में कहा जा रहा है कि साहब की हालत कुछ ऐसी हो गई है मानो वे बार-बार कह रहे हों—"मुझे जाने दो...", लेकिन सिस्टम का जवाब है—"अभी नहीं!"
8 दिल्ली की दस्तक या प्रदेश में बड़ी जिम्मेदारी?
पुलिस महकमे के एक सीनियर आईपीएस अफसर इन दिनों दो बड़ी संभावनाओं के बीच खड़े नजर आ रहे हैं। चर्चा है कि साहब बहुत जल्द केंद्रीय प्रतिनियुक्ति की राह पकड़ सकते हैं। हाल ही में एसीसी ने उन्हें केंद्र में एडीजी स्तर की पोस्टिंग के लिए इम्पैनल कर दिया है। इसके बाद से महकमे में कयास तेज हो गए हैं कि अब दिल्ली बुलावे में ज्यादा देर नहीं है। हालांकि, कहानी का दूसरा पहलू भी कम दिलचस्प नहीं है। प्रदेश में भी साहब के लिए एक अहम जिम्मेदारी तय करने की कवायद चल रही है। हाल ही में एक एडीजी के रिटायर होने से खाली हुए महत्वपूर्ण पद पर साहब का नाम गंभीरता से चर्चा में रहा। माना जा रहा था कि उसी कुर्सी पर उनकी ताजपोशी हो जाएगी। लेकिन फिलहाल सरकार ने कोई अंतिम फैसला नहीं लिया है। व्यवस्था बनाए रखने के लिए उस पद का अतिरिक्त प्रभार एक दूसरे सीनियर अफसर को सौंप दिया गया है। इससे यह चर्चा और तेज हो गई है कि कहीं सरकार साहब को प्रदेश में रोकने की कोशिश तो नहीं कर रही, जबकि दूसरी ओर दिल्ली भी उनके इंतजार में बैठी है।
9 इंजीनियर साहब के आगे नतमस्तक हैं सीनियर अफसर
जमीनों पर विकास की अनुमति देने वाली संस्था में पदस्थ पॉवरफुल इंजीनियर के आगे बड़े से बड़े आईएएस तक नतमस्तक हैं। वजह है इंजीनियर साहब सीधे सरकार से जुड़े हुए हैं। इस वजह से उन पर किसी का बस नहीं है। साहब के पास दो महत्वपूर्ण संस्थाओं के पद हैं। साहब के अपने नियम, कायदे और कानून हैं। साहब ने रेट भी तय कर रखें। कोई भी परमिशन चाहिए तो पांच लाख रुपये एकड़ के हिसाब से हिसाब से साहब के पास रुपये जमा कीजिए आपको परिमिशन मिल जाएगी। हां लेकिन इसमें भी साहब की एक शर्त यह रहेगी कि वे फाइल अपने पास बुलाने के लिए किसी अधिनस्थ अफसर को नहीं बोलेंगे। यह काम आपको ही करना होगा। साहब सिर्फ अपने काम का कमिशन लेते हैं पूरे काम का ठेका नहीं। सौदा मंजूर हो तो बात करिए वर्ना साहब के पास ग्राहकों की कमी बिल्कुल नहीं है।
10 मैडम का बदला-बदला अंदाज़!
लूप लाइन में पदस्थ एक सीधी भर्ती की आईएएस मैडम इन दिनों अपनी शाखाओं के बाबुओं पर कुछ ज़्यादा ही मेहरबान नज़र आ रही हैं। हाल यह है कि जो मैडम कुछ महीने पहले तक छोटी-छोटी बातों पर पारा चढ़ा लेती थीं, वही अब बाबुओं से मुस्कुराकर बात करती हैं। इतना ही नहीं, चाय-पानी का हालचाल पूछने तक लगी हैं। मैडम के इस बदले-बदले अंदाज़ ने पूरे विभाग में चर्चाओं का बाज़ार गर्म कर दिया है। अधिकारी हों या कर्मचारी, हर कोई यही जानना चाहता है कि आखिर ऐसा कौन-सा जादू हो गया कि सख्त मिजाज़ मैडम अचानक इतनी सहज और मिलनसार हो गईं। कहते हैं कि जब से इस बदलाव की असली वजह कुछ चुनिंदा लोगों तक पहुँची है, तब से दफ्तर के गलियारों में फाइलों से ज़्यादा उसी राज़ की फुसफुसाहट सुनाई दे रही है। अब वजह क्या है, यह तो जानने वाले ही जानें, लेकिन इतना तय है कि इन दिनों मैडम के बदले तेवर विभाग में सबसे चटपटा चर्चा का विषय बने हुए हैं।





