कमिश्नर साहब के पास पेंडिंग हुई डेढ़ हजार फाइलें : पहली ही बैठक में आईपीएस पर नाराज हुए बड़े साहब : दिल्ली दौरा और 'लेडी टीम' बनी कलेक्टर मैडम के तबादले की वजह!

मध्यप्रदेश की अफसरशाही की 10 बड़ी अंदरूनी खबरें पढ़ें। IAS-IPS तबादले, चीफ सेक्रेट्री, कलेक्टर, कमिश्नर, ACS, SP और मंत्रालय से जुड़ी चर्चित अपडेट।
कमिश्नर साहब के पास पेंडिंग हुई डेढ़ हजार फाइलें : पहली ही बैठक में आईपीएस पर नाराज हुए बड़े साहब : दिल्ली दौरा और 'लेडी टीम' बनी कलेक्टर मैडम के तबादले की वजह!
1 कमिश्नर साहब के पास पेंडिंग हुई डेढ़ हजार फाइलें 
एक बड़े विभाग के कमिश्नर साहब इन दिनों अपनी कार्यशैली को लेकर खूब चर्चा में हैं। हालात ऐसे हैं कि उनके टेबल पर ई-फाइल और मैन्युअल फाइल मिलाकर करीब डेढ़ हजार फाइलें लंबित बताई जा रही हैं। दिलचस्प बात यह है कि साहब लगभग हर फाइल पर "चर्चा करें" लिख देते हैं, लेकिन जैसे ही कोई अफसर चर्चा करने उनके कक्ष में पहुंचता है, उसका स्वागत सवालों से नहीं, फटकार से होता है। नतीजा यह है कि एक-दो बार की डांट के बाद अधिकांश अफसरों ने साहब के कमरे का रास्ता ही छोड़ दिया है। साहब का फरमान है कि बिना समय लिए कोई मिलने न आए। मगर अफसरों का दर्द यह है कि समय मांगने पर भी समय नहीं मिलता। ऐसे में "चर्चा करें" लिखी फाइलें चर्चा का इंतजार करती रह जाती हैं और लंबित फाइलों का आंकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है। विभाग में अब चुटकी ली जा रही है कि फाइलों से ज्यादा इंतजार तो "चर्चा" का हो रहा है।

2 पहली ही बैठक में आईपीएस पर नाराज हुए बड़े साहब
नए बड़े साहब ने कुर्सी संभालते ही अपने इरादे साफ कर दिए। पहली ही समीक्षा बैठक गृह विभाग के साथ हुई और सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की रही कि जहां पहले ऐसी बैठकें घंटों खिंचती थीं, वहीं इस बार पूरा काम महज बीस मिनट में निपट गया। तेज रफ्तार समीक्षा के बीच बड़े साहब ने एक वरिष्ठ आईपीएस अफसर से कुछ अहम सवाल पूछ लिए, लेकिन जवाब उम्मीद के मुताबिक नहीं मिले। बस फिर क्या था, बड़े साहब ने वहीं दो टूक कह दिया कि बैठक में आएं तो पूरी तैयारी के साथ आया करें। बैठक खत्म होने के बाद गलियारों में चर्चा इस बात की रही कि यह फटकार भले ही एक अफसर को मिली हो, लेकिन संदेश पूरी नौकरशाही के लिए था। अब कहा जा रहा है कि बड़े साहब के दौर में बैठकों में हाजिरी से ज्यादा तैयारी मायने रखेगी, क्योंकि अधूरे होमवर्क के लिए अब कोई रियायत मिलने वाली नहीं है।

3 दिल्ली दौरा और 'लेडी टीम' बनी कलेक्टर मैडम के तबादले की वजह!
हाल ही में जारी तबादला सूची में सीधी भर्ती की एक कलेक्टर मैडम का नाम सबसे ज्यादा चर्चा में रहा। उन्हें हटाकर प्रदेश के पूर्वी हिस्से के एक आदिवासी बहुल जिले की जिम्मेदारी सौंप दी गई। सत्ता और प्रशासनिक गलियारों में इस फैसले के पीछे दो वजहें खूब तैर रही हैं। पहली चर्चा यह है कि मैडम का दिल्ली दौरा लगभग तय कार्यक्रम बन गया था। कहा जाता है कि शुक्रवार को जिले के नजदीकी शहर से उड़ान भरकर दिल्ली पहुंच जाती थीं और सोमवार को वापस लौटती थीं। इससे जिले में उनकी उपलब्धता को लेकर लगातार सवाल उठ रहे थे। दूसरी वजह जिले की 'ऑल लेडी टीम' बताई जा रही है। संयोग ऐसा था कि कलेक्टर, एडीएम, एसडीएम और जिला पंचायत सीईओ, सभी अहम पदों पर महिला अधिकारी थीं। लेकिन यह टीम तालमेल के बजाय आपसी खींचतान के लिए ज्यादा सुर्खियों में रही। गलियारों में चर्चा है कि एक-दूसरे की शिकायतें ऊपर तक पहुंच रही थीं। पिछले दिनों मुख्यमंत्री ने सीनियर अफसरों के साथ बैठक में खुद यह दोनों बातें कही थी। उधर, जनप्रतिनिधियों ने भी कामकाज को लेकर अपनी नाराजगी दर्ज कराई थी। वैसे बताया जा रहा है कि मैडम को नई पोस्टिंग बिल्कुल पसंद नहीं आ रही है। वो इसे बदलवाने की जुगाड़ में लगी हैं।

4 बुके और स्वागत सत्कार से एसपी साहब ने बनाई दूरी
लूप लाइन से निकलकर हाल ही में जिले की कमान संभालने वाले एक युवा आईपीएस साहब ने आते ही अपने तेवर साफ कर दिए। आमतौर पर नए कप्तान के स्वागत में मातहत अफसर बुके, शॉल और फोटो सेशन की पूरी तैयारी रखते हैं, लेकिन इस बार नजारा कुछ अलग ही रहा। जैसे ही साहब पहुंचे, स्वागत की तैयारियां धरी रह गईं। बताया जाता है कि उन्होंने बुके और सम्मान की औपचारिकताओं को नजरअंदाज किया और सीधे अपने चैंबर में पहुंचकर कार्यभार संभाल लिया। इतना ही नहीं, कुछ ही देर में अधिकारियों की बैठक बुलाकर कामकाज की समीक्षा भी शुरू कर दी। पुलिस महकमे में अब चर्चा है कि नए कप्तान शुरुआत से ही यह संदेश देना चाहते हैं कि उनकी प्राथमिकता स्वागत-सत्कार नहीं, बल्कि काम है। गलियारों में यह भी कहा जा रहा है कि साहब अपनी छवि एक सख्त, अनुशासित और ईमानदार अधिकारी की बनाना चाहते हैं, ताकि अगली पोस्टिंग किसी बड़े और अहम जिले में मिल सके। फिलहाल मातहतों ने भी समझ लिया है कि इस कप्तान के यहां बुके से ज्यादा महत्व फाइलों, कानून-व्यवस्था और नतीजों का रहेगा।

5 आने वाले भी मुरीद, जाने वाले भी कायल!
मंत्रालय के पांचवें फ्लोर पर पिछले दिनों आईएएस अफसरों की हाई-प्रोफाइल टी पार्टी खूब चर्चा में रही। मौका था एक चीफ सेक्रेट्री की विदाई और नए चीफ सेक्रेट्री के स्वागत का। चाय की चुस्कियों के साथ पुराने किस्से, नए समीकरण और सत्ता के गलियारों की कई दिलचस्प बातें भी सामने आईं। लेकिन पूरी महफिल में सबसे ज्यादा जिस नाम की चर्चा रही, वह एक युवा आईएएस अफसर का था। दिलचस्प बात यह रही कि मंच पर मौजूद आने वाले चीफ सेक्रेट्री और विदा ले रहे चीफ सेक्रेट्री—दोनों ने ही उनके कामकाज की खुलकर तारीफ की। बात सिर्फ औपचारिक प्रशंसा तक सीमित नहीं रही, बल्कि लंबे समय से अटके प्रमोशन के मामलों को गति देने से लेकर यूसीसी की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने तक उनकी कार्यशैली के उदाहरण दिए गए। अफसरशाही के जानकारों का कहना है कि किसी एक अफसर को एक साथ पुराने और नए दोनों "बॉस" का खुला समर्थन मिलना विरले ही देखने को मिलता है। वैसे, यह भी कम दिलचस्प नहीं कि लंबे समय तक लूप लाइन में रहे इस सीधी भर्ती के आईएएस को हाल ही में जारी तबादला सूची में एक जिले की कमान यानी कलेक्टर की जिम्मेदारी सौंप दी गई। 

6 एमडी को फटकार पड़ी तो रातों-रात निकले प्रमोशन आदेश!
सरकार का साफ संदेश था कि अधिकारी-कर्मचारियों के प्रमोशन में किसी भी तरह की देरी नहीं होनी चाहिए। वजह भी खास थी। प्रमोशन प्रक्रिया को चुनौती देते हुए कुछ अफसर कोर्ट पहुंच चुके थे और सरकार चाहती थी कि अदालत से कोई रोक लगने से पहले सभी आदेश जारी हो जाएं। लेकिन एक सरकारी कंपनी के एमडी साहब की कार्यशैली कुछ अलग ही चल रही थी। चर्चा है कि जहां सरकार तेजी चाहती थी, वहीं साहब हर फाइल में नया पेंच तलाशने में जुटे थे। किसी अफसर की दस साल पुरानी सीआर निकलवाई जा रही थी तो किसी की पांच साल पुरानी शिकायत की फाइल मंगाई जा रही थी। हर बार जब वरिष्ठ अधिकारी प्रमोशन आदेश जारी करने को कहते, साहब कोई नया कारण सामने रख देते। आखिरकार मामला इतना बढ़ा कि ऊपर से दो-टूक संदेश पहुंचा—हर हाल में तुरंत आदेश जारी करें, नहीं तो कार्रवाई के लिए तैयार रहें। बस फिर क्या था... जो फाइलें कई दिनों से अटकी थीं, वे देर रात अचानक रफ्तार पकड़ गईं और प्रमोशन आदेश भी जारी हो गए। अब मंत्रालय के गलियारों में चुटकी ली जा रही है कि जिस काम के लिए इतने दिनों तक वजहें तलाशीं जा रही थीं, वही काम एक फटकार के बाद कुछ घंटों में पूरा हो गया। वैसे, साहब की एक और आदत भी खूब चर्चा में रहती है। कहा जाता है कि उनका असली "ऑफिस टाइम" शाम ढलने के बाद शुरू होता है और विभाग के गेस्ट हाउस से ही कई अहम फैसले आकार लेते हैं। इसलिए लोग अब मजाक में कह रहे हैं कि इस बार भी प्रमोशन का सूरज दिन में नहीं, रात में उगा।

7 सूखा खत्म... एसीएस साहब की आखिर लग ही गई लॉटरी!
तबादला सूची में इस बार सबसे ज्यादा चर्चा एक एसीएस साहब की नई तैनाती की रही। लंबे समय से लूप लाइन में वक्त गुजार रहे साहब की आखिरकार किस्मत खुल ही गई। बरसों बाद उन्हें ऐसा विभाग मिला है, जिसे नौकरशाही की भाषा में "हरियाली वाला" माना जाता है। मंत्रालय के गलियारों में चुटकी ली जा रही है कि सरकार ने "पानी पिलाने वाले विभाग" की जिम्मेदारी देकर साहब के करियर का सूखा खत्म कर दिया है। हालांकि, इस नई जिम्मेदारी के साथ साहब की परीक्षा भी शुरू हो गई है। उनकी कार्यशैली को लेकर महकमे में पहले से ही तरह-तरह की चर्चाएं हैं। कहा जाता है कि साहब फाइलों से ज्यादा दूरी बनाए रखना पसंद करते हैं और मातहत अफसरों को ही ज्यादातर फैसलों का इंतजार करना पड़ता है। अब मुश्किल यह है कि नया विभाग सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय की निगरानी में रहता है, जहां काम की रफ्तार और नतीजों पर पैनी नजर रहती है। यही वजह है कि प्रशासनिक गलियारों में चर्चा है कि इस बार सिर्फ विभाग नहीं बदला है, बल्कि साहब को भी खुद को बदलना पड़ेगा। वरना जिस तेजी से लॉटरी लगी है, उसी तेजी से टिकट कटने में भी ज्यादा वक्त नहीं लगेगा।

8 काम आ गई सरकार की करीबी!
सरकार की करीबी आखिरकार एक प्रमोटी आईएएस अफसर के काम आ ही गई। लंबे समय से लूप लाइन में पड़े साहब फील्ड पोस्टिंग के लिए हाथ-पांव मार रहे थे, लेकिन हर बार किस्मत दगा दे रही थी। इस बार जारी तबादला सूची में आखिर उनकी मुराद पूरी हो गई। भले ही छोटा जिला मिला हो, लेकिन साहब अब कलेक्टर बन गए हैं। वैसे, इस मंजिल तक पहुंचने का सफर आसान नहीं था। पहले साहब ने राजधानी छोड़कर अपनी पोस्टिंग सरकार के गृह जिले में करवाई। इसके बाद खुद और अपने करीबी लोगों के जरिए सत्ता के गलियारों में मजबूत समीकरण साधे। कहा जा रहा है कि इन्हीं नजदीकियों का असर आखिरकार तबादला सूची में दिखा और साहब लूप लाइन से निकलकर फील्ड में पहुंच गए। अब प्रशासनिक गलियारों में चर्चा है कि मेहनत से ज्यादा "सही जगह की करीबी" ने साहब की राह आसान कर दी।

9 सीएस की कुर्सी छूटी, साहब का सपना भी टूट गया!
प्रदेश के नए चीफ सेक्रेट्री के नाम का ऐलान होते ही मंत्रालय से लेकर दिल्ली तक चर्चाओं का दौर शुरू हो गया। किसी के चेहरे पर खुशी थी तो किसी के अरमानों पर पानी फिर गया। सबसे ज्यादा मायूस बताए जा रहे हैं प्रदेश कैडर के एक वरिष्ठ आईएएस अफसर, जो इन दिनों केन्द्र में पदस्थ हैं। अफसरशाही के गलियारों में चर्चा है कि साहब को पूरा भरोसा था कि इस बार चीफ सेक्रेट्री की कुर्सी उन्हीं के हिस्से आएगी। उन्हें अपने अनुभव के साथ-साथ दिल्ली में मजबूत पकड़ और निवर्तमान चीफ सेक्रेट्री से करीबी रिश्तों पर भी पूरा विश्वास था। लेकिन आखिरी वक्त में बाजी पलट गई और कुर्सी किसी और के नाम हो गई। कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। जाते-जाते निवर्तमान चीफ सेक्रेट्री ने सार्वजनिक तौर पर यह कह दिया कि केन्द्र में पदस्थ ये वरिष्ठ आईएएस भी चीफ सेक्रेट्री की दौड़ में थे और उनके पसंदीदा अधिकारियों में शामिल थे। बस, यही बात अब अफसरशाही में नई चर्चा का विषय बन गई है। लोग कह रहे हैं कि जब मंजिल नहीं मिली तो इस तरह का जिक्र पुराने जख्मों को और हरा कर गया।

10 तबादले से पहले ही एसीएस की मंत्रालय से दूरी!
चीफ सेक्रेट्री की दौड़ में शामिल रहे एक एसीएस साहब को उस वक्त बड़ा झटका लगा, जब सरकार ने उनसे जूनियर अधिकारी को प्रदेश का प्रशासनिक मुखिया बना दिया। अनुभवी साहब ने हालात को तुरंत भांप लिया। उन्हें अच्छी तरह पता था कि परंपरा के हिसाब से अब जूनियर के अधीन मंत्रालय में काम करना मुश्किल होगा और मंत्रालय से बाहर की पोस्टिंग तय मानी जाएगी। कहते हैं कि साहब ने तबादला आदेश का इंतजार भी नहीं किया। आदेश जारी होने से पहले ही उन्होंने मंत्रालय में सक्रिय कामकाज से खुद को लगभग अलग कर लिया और दफ्तर आना-जाना भी कम कर दिया। बाद में जब आदेश आया तो उन्हें लूप लाइन की जिम्मेदारी मिल गई। अब गलियारों में चर्चा है कि रिटायरमेंट में चंद महीने ही बचे हैं और अवकाश का खाता भी भरा पड़ा है। ऐसे में साहब अब फाइलों से ज्यादा छुट्टियों का हिसाब-किताब निपटाने के मूड में हैं। नौकरशाही में चुटकी ली जा रही है कि जब मंजिल बदल ही गई, तो साहब ने सफर भी अपने हिसाब से तय करने का फैसला कर लिया



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